Tue. Sep 17th, 2019

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Awaam ki awaaz

उदय राम चे का लेखः धारा 370 और 35 A को तोड़ना इंसानियत, जम्हूरियत,कश्मीरियत के खात्मे की तरफ बढ़ना है।

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5 अगस्त 2019 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में Black Day के रूप में दर्ज हो गया। इस दिन विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र का दावा करने वाला भारत, जिसकी चुनी हुई सरकार ने गैर लोकतांत्रिक तरीके से अपने ही स्वायत राज्य जम्मू और कश्मीर की स्वायत्ता खत्म कर दी। इसके साथ ही राज्य के अस्तिव को मिटाते हुए तानाशाही सरकार ने जम्मू और कश्मीर को 2 हिस्सो में बांटते हुए (लद्दाख और जम्मू-कश्मीर) केंद्र शाषित प्रदेश बना दिया।

ये फैसला गैर लोकतांत्रिक इसलिए है क्योकि इस फैसले में जम्मू-कश्मीर विधान मंडल की कोई अनुमति नही ली गयी जिसका सविधान की धारा 270 (3) में प्रावधान है कि जम्मूकश्मीर के बारे में ऐसा कुछ भी फैसला लेने वाला प्रस्ताव जम्मूकश्मीर विधान मंडल की सहमति के बिना संसद में पुनर्स्थापित नही किया जाएगा।  लेकिन सरकार ने बड़े ही शातिराना तरीके से वहां की चुनी हुई सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया। राष्ट्रपति शासन लगते ही राज्य का सर्वेसर्वा राज्यपाल बन गया। सरकार ने इसके बाद ही इस गैर लोकतांत्रिक फ़ैसले को अमलीजामा पहनाया। सरकार ने फैसला लेते हुए वहाँ की जनता और राजनीतिक पार्टियों से बात करना तो दूर उल्टे पूरे कश्मीर की जनता को बन्दूक के दम पर खुली जेल में तब्दील कर दिया। वहां के पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और सामाजिक-राजनीतिक लोगो को घर में नजरबन्ध कर दिया गया।

वहाँ की राजनीतिक पार्टियों का सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल जब फैसले से 2 दिन पहले राज्यपाल से मिलने गया। प्रतिनिधि मंडल ने जब इस बारे आंशका व्यक्त की तो राज्यपाल ने ऐसे किसी भी फैसले लेने बारे कोई जानकारी होने से साफ-साफ मना किया। इसके साथ ही राज्यपाल ने आश्वाशन भी दिया कि बिना राजनीतिक पार्टियों को विश्वास में लिए कोई फैसला जम्मू-कश्मीर बारे केंद्र सरकार नही लेगी। लेकिन अगले ही दिन पूरे कश्मीर को सेना के सहारे बंधक बनाया गया और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करने वाले मुल्क की सत्ता ने कश्मीर और कश्मीरियत को अपने पांव तले रौंध दिया। सरकार के इस फैसले में NDA में शामिल पार्टियों में नीतीश की पार्टी जनता दल युनाइडेट ने विरोध किया जबकी विपक्ष में होने का ढोंग करने वाली आम आदमी पार्टी और बसपा ने इस फैसले का समर्थन किया।

फैसले के बाद जिस प्रकार से पूरे देश मे ख़ासकर उतर भारत के मैदानी राज्यो में जश्न मनाया गया। शोशल मीडिया पर कश्मीरी लड़कियों की फोटो डाल कर भद्दे-भद्दे कॉमेंट किये गए। उनको खरीद कर लाने की बात की गई। वहां की जमीन खरीदने की बात की गई। इससे ये साफ जाहिर होता है कि भारत का बहुमत व्यक्ति चाहता है कि कश्मीर की जमीन पर हमारा कब्जा हो जाये और कश्मीरी आवाम को हम खदेड़ कर पाकिस्तान भेज दे या पुरुषों को गोली मार दे व महिलाओं को रैखले बना ले। ऐसी अमानवीय मानसिकता से भरे हुए नौजवान कल से जश्न मना रहे है। भारतीय भांड मीडिया के बारे में बात करना ही बेमानी होगा क्योंकि इसी मीडिया ने  जश्न मना रहे लोगो को इंसान से जॉम्बी बनाया है। इसी मीडिया ने धीरे-धीरे लोगो के दिमाक में जहर भरा है। इसी जहर के कारण आज  लोग अंधराष्ट्रवाद, कट्टर धार्मिकता की तरफ बढ़ गए है। भारत का बहुमत नौजवान जॉम्बी बनता जा रहा है।

जॉम्बी

जॉम्बी जो चलता तो है, बोलता भी है लेकिन मरा हुआ है। जॉम्बी जो सिर्फ अपने आका का हुक्म मानता है। वो अपने आका के हुक्म से सबको जॉम्बी बनाना चाहता है। जॉम्बी जो अपने से अलग दिखने वालों को मार देता है। उनका खून पीता है। आज भारत का बहुमत नौजवान भी क्या ऐसा ही नही कर रहा है? वो जय श्री राम न बोलने वालों, भारत माता की जय, गाय-गोबर के नाम पर अल्पसंख्यको और गरीब लोगो को मारने वाले ग्रुपो में शामिल है या हत्यारे ग्रुपो का समर्थन कर रहा है। बड़ा तबका चुप्पी बनाये हुए है। वो अपने आका के खिलाफ लिखने-बोलने वालों को भी मार रहा है। वो रोटी-कपड़ा-मकान की बात नही कर रहा। वो शिक्षा-स्वास्थ्य, बिजली, पानी, रोजगार की बात नही कर रहा है। इसके विपरीत जो इन मुद्दों पर बात कर रहा है उनको ये जॉम्बी मार रहा है।

ईसा मसीह को सूली पर लटका कर खुशीयां मनाने वाले, लाखो यहूदियों को तड़फा-तड़फा कर मरते देख कर हंसने वाला हिटलर, गांधी को मारकर मिठाई बांटने वाले हिन्दुतत्व का झंडा उठाये आंतकवादी, ISISI के वहाबी इस्लामिक आंतकवादी, फिलस्तीन के लोगो को गोलियों से भूनते देख कर खुशी मनाने वाले इजराइली ये सब जॉम्बी थे। अब इसी जॉम्बी की श्रेणी में भारत का वो नौजवान आ गया है जो कश्मीर और कश्मीरियत को सत्ता द्वारा कुचलते हुए देखकर खुशी मना रहा है।

 जम्मूकश्मीर की स्वायत्ता धारा 370 और 35 A में बंधी हुई थी। क्या है?

 भारत जिसमे क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग सँस्कृतियाँ, अनेको धर्म-सम्प्रदाये, अनेको भाषाएं-बोलियां विराजमान है। बहुसंख्यक लोग जिनका धर्म, भाषा, संस्कृती एक जैसी है। वो दूसरी संस्कृतियो, भाषाओं, जातियों, धर्म को तहस-नहस न कर दे। इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए भारतीय सविधान ने अलग से विशेष रियायते दी है। जैसे SC-ST-OBC, विकलांग, महिलाएं, एक्स सैनिक इनको आरक्षण दिया गया, पूर्व के स्टेट के साथ साथ अन्य 10 राज्यो को भी धारा 371 A से J तक को भी अलग से विशेष रियायते दी गयी, आदिवासियों को सविधान की 5वीं व 6वीं अनिसुची के अनुसार रियायते दी गयी। ऐसे ही कश्मीर को धारा 370 और 35A के तहत विशेष राज्य का दर्जा दिया गया। कश्मीरी आवाम ने इसी आस्वासन पर भारत की सत्ता पर विश्वास किया था कि भविष्य में जो उनको विशेष अधिकार भारत सरकार ने दिए है, उनमें कोई भी बदलाव  बिना जम्मू-कश्मीर की जनता से पूछे नही होगा। लेकिन अफसोस  भारत की सत्ता ने इन 65 सालो में धीरे-धीरे कश्मीर के सैविधानिक अधिकारों का हनन ही किया। जब कश्मीर आवाम ने अपनी स्वायत्ता के लिए आवाज उठानी शुरू की तो भारतीय सत्ता ने कश्मीर को सेना के हवाले कर दिया। इस पूरे खेल में भारत के साथ-साथ पाकिस्तान की सरकारे भी खलनायक की भूमिका निभाती रही। पाकिस्तान सरकार द्वारा कश्मीर के आंदोलन का समर्थन करने से शेष भारत के लोग इनके खिलाफ हो गए।

 कश्मीरी पंडितों को निकालने के पीछे भी पाकिस्तान समर्थक आंतकवादी गुट शामिल रहे लेकिन पंडितो को निकालने का आरोप कश्मीरी आवाम पर लगा।

हमारे यहां एक कहावत है कि लोग अपने दुखों से दुखी नही है दूसरों के सुखों से दुखी है  भारत के दलित, पिछड़े, महिला जो जश्न में डूबे हुए है। क्या उनसे पूछा नही जाना चाहिए कि वो खुद विशेष अधिकार आरक्षण लिए हुए है। लेकिन उनको कश्मीर के विशेष अधिकारों से दिक्कत है।

मायावती राजनीति में आने के बाद दलित की बेटी से दौलत की बेटी बन गयी। बिना आरक्षण तो सवर्ण उसको किसी पंचायत का मेंबर भी नही बनने देते लेकिन खुद विशेष अधिकार के सहारे मुख्यमंत्री बनी लेकिन उसको कश्मीर के विशेष अधिकारों से प्रॉब्लम है। वो धारा 370 के हटने का स्वागत कर रही है। क्या आज उनसे पूछा नही जाना चाहिए कि अगर भविष्य में केंद्र सरकार जब आरक्षण को खत्म करेगी तो वो समर्थन करेगी या विरोध करेगी।

अरविंद केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल तो छुपा हुआ दक्षिण पंथी और तानाशाही परवर्ती का व्यक्ति है ही। इन्होंने भी जम्मू-कश्मीर को तोड़कर केंद्र शाषित राज्य बनाने का स्वागत किया है। ये ही केजरीवाल दिल्ली को केंद्र शाषित राज्य से पूर्ण राज्य बनाने की लड़ाई लड़ने का ड्रामा करता है। दहाड़े मार कर रोने का नाटक करता है की केंद्र शाषित प्रदेश में चुने हुए मुख्यमंत्री की न चलकर केंद्र द्वारा थोपे गए उपराज्यपाल की चलती है। ये लोकतन्त्र के खिलाफ है। लोकतन्त्र की दुहाई देने वाला अंदर से गैरलोकतांत्रिक है ये सामने आ ही गया।

कॉग्रेस

कॉग्रेस पार्टी ने इस फैसले की खिलाफत जरूर की है लेकिन अपने लंबे कार्यकाल में इसी पार्टी ने इस कानून को कमजोर किया। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी ब्यान देने तक सिमट कर रह गयी है। उसका कैडर और भाजपा के कैडर में कोई ज्यादा अंतर नही बचा है। कॉग्रेस कार्यकर्ता भाजपा के फैसले का स्वागत ही कर रहे है। कश्मीर के पक्ष में और गैर लोकतांत्रिक फैसले के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा करने में सक्षम नही है।

वामपंथी पार्टियां

कम्युनिस्ट पार्टियों ने जरूर इस मुद्दे पर अपना पक्ष साफ-साफ रखा है। उन्होंने सड़क से संसद तक इस फैलसे का विरोध किया है। लेकिन ये लड़ाई लम्बी चले या भविष्य में उनका क्या कदम रहेगा ये अभी सब पर्दे के पीछे है।

बुद्विजीवी

बुद्विजीवियों के एक बड़े तबके से प्रगतिशीलता का नकाब इस फैसले ने उतार दिया है। बड़े-बड़े बुद्विजीवीयों ने इस फैसले को समर्थन देकर मोदी की तानशाही के आगे घुटने टेक दिए है।  लेकिन अब भी अवाम का एक बड़ा तबका जो भगत सिंह को अपना आदर्श मानता है। जो मानवता, समानता के लिए लड़ता है। वो कश्मीर और कश्मीरियत को बचाने के लिए मजबूती से इस गैर लोकतांत्रिक फैसले का विरोध कर रहा है। ऐसे क्रांतिकारी ताकत जो अभी कमजोर जरूर है लेकिन अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है। इसी क्रांतिकारी ताकत से जॉम्बी और उनका आका डरा हुआ है। वो ऐसी ताकत को मिटाने के लिए काले कानून UAPA को मजबूत कर रहा है। उन पर हमले करवा रहा है। आज उस ताकत को वैचारिक और सांगठनिक तौर पर मजबूत करने की जरूरत है। आज कश्मीर के आवाम के अधिकारों के साथ एकजुटता दिखाने की जरूरत है। अगर कश्मीरी आवाम में अलगाववाद की भावना बढ़ी तो कश्मीर ग्रह युद्ध की तरफ बढ़ जाएगा है। अगर कश्मीर ग्रह युद्ध की तरफ बढ़ा तो इसके भयंकर परिणाम कश्मीर के साथ-साथ भारत और पाकिस्तान के आवाम को झेलने पड़ेंगे।

इंसानियतजम्हूरियतकश्मीरियत जिंदाबाद

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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