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जानिए क्या है? रवीश कुमार को मिलने वाला रेमन मैग्सेस आवार्ड।

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अशोक कुमार पांडेय

रेमन मैग्सेसे या रेमॉन मैगसायसाय को लेकर एक मजेदार बहस शुरू होनी ही थी. यह हमारे समय की एक विडम्बना ही है कि एक तरफ़ संघी इसे कम्युनिस्टों को मिलने वाला पुरस्कार बता रहे हैं दूसरी तरफ़ मित्र रेमन के इतिहास को खंगालते हुए इसे एक वाम विरोधी पूँजीवादी षड्यंत्र बता रहे हैं. सोम ने अरुंधती के एक लेख के सहारे बताया है कि कैसे यह वाम विरोधी है और कई लोग अनेक URL के सहारे बता रहे हैं कि रेमन ने कैसे कम्युनिस्टों को मरवाया.

मुझे इसमें कोई भ्रम भी नहीं. फिलिपीन्स के इस पूर्व राष्ट्रपति का इतिहास जानता हूँ. जानने को तो उस मैन के बारे में भी जानता हूँ जिससे मैन-बुकर प्राइज़ बना है और बुकर के बारे में भी. 1972 में बुकर पुरस्कार लेते हुए बुकर-मैककॉनेल की आलोचना करते हुए कहा था कि यह कंपनी कैरेबियन इलाके में 130 साल के अपने चीनी उत्पादन के दौरान उस इलाके की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार है. मैन ग्रुप मैनेजमेंट बिजनेस चलाता है. फिर भी अरुंधती का सम्मान करते ही हैं हम. बुकर पर भी कोई सवाल नहीं उठता. उन्होंने ख़ुद भी नहीं उठाया.

अल्फ्रेड नोबल के बारे में तो बताना ही क्या है! अपनी भाषा में कहूँ तो विनाश के जनक. ह्रदय परिवर्तन मान लिया जाता है और पुरस्कारों से यों अमर कर दिए गए कि लोग विस्फोटक भूल ही गए! यही चाहते थे वे कि दुनिया उन्हें ठीक से याद करे.

मैग्सेसे महोदय शीतयुद्ध के दौर में फिलिपीन्स के राष्ट्रपति बने. उन्होंने अमेरिका का पक्ष चुना. सीटो में शामिल हुए. फिलिपीन्स में उन्हें सबसे ईमानदार राष्ट्रपतियों में माना जाता है और उनके कृषि सुधारों के साथ शिक्षा सुधारों का बड़ा सम्मान है. शीत युद्ध को ज़रा दूर रख कर देखें तो ये बेहद समाजवादी प्रवृत्ति के लगते हैं. अपने नेहरू भी किसी पक्ष में भले नहीं गए थे लेकिन विकास और मॉडल जो था वह अपनी प्रवृत्ति में पूंजीवादी ही तो था. तिलंगाना के शहीदों का खून उनके आस्तीन पर नहीं है? तो क्या करें? बताइए?

बीत चुका है शीतयुद्ध. बदल चुके हैं हालात. आज जहाँ है देश वहाँ वामपंथ उपस्थित है तो बहुत पीछे. मानवता के मूल मुद्दे खतरे में हैं तो रवीश जैसा पत्रकार भी नेमत लगता है. लिस्ट देखिये ज़रा मैग्सेसे की. संदीप पांडे हों कि संजीव चतुर्वेदी, अरविन्द केजरीवाल हों या पांडुरंग शास्त्री अठावले. किधर खड़े दीखते हैं इस युद्ध में?

शीतयुद्ध के बाद के हालात में उस दौर को मानक बनाएंगे तो बड़ी समस्या होगी. साहित्य अकादमी से लेकर नोबेल तक, कम्युनिस्टों के लिए कोई पुरस्कार नहीं बना. लेकिन फिलहाल जो लिबरल हैं कम से कम, जो साम्प्रदायिक नहीं हैं, जिनके नाखूनों पर लहू नहीं लगा…उन्हें दोस्त न समझना बेवकूफी होगी.

इसीलिए रवीश को बधाई दीजिये न दीजिये. शांत होकर थोड़ा सोचिये…

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