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ज़ायरा पर गुस्सा होने से पहले सोचिए क्या आपने कभी इस पर गुस्सा दिखाया कि सिनेमा और टीवी सांप्रदायिकता क्यों परोस रहा है?

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ज़ैग़म मुर्तज़ा

आपका ग़ुस्सा इस बात पर तो है कि किसी ने मज़हब के नाम पर सिनेमा छोड़ दिया… लेकिन आपने इस बात पर कभी ग़ुस्सा नहीं दिखाया कि सिनेमा और टीवी मज़हबी चरस क्यों परोस रहा है? पिछले 10-15 साल में बने धारावाहिक और फ़िल्म देखिए। उनमें सिवा मज़हबी चरस, मज़हबी नफरत और एक ख़ास मज़हब को निशाना बनाने के सिवा कुछ हो? आज अगर दाढ़ी रखना या कुर्ता पैजामा पहनना मज़हबी अपराध नज़र आता है तो इसलिए कि हमारे टीवी और सिनेमा ने सबको ऐसा बताया है। सिनेमा क्या कहता है? दाढ़ी वाला अगर गले में चेक का स्कार्फ़ टांगे है तो पक्का आतंकवादी होगा। लड़की का अपहरण करने वाला दाढ़ी टोपी वाला ही होगा… अंडरवर्ल्ड का भाई सिर्फ पठानी सूट पहनता है और आंखों में सुरमा भी लगाता है। बात सिर्फ प्रतीकों तक खत्म नहीं होती है।

अकबर और खिलजी छोड़िये… दाराशिकोह का सेनापति रुस्तम ख़ाँ हिन्दू लड़कियों का अपृह्ता है… अकबर का संरक्षक बैरम ख़ाँ सिरे से चरित्रहीन है, दफ्तर का बेईमान मियां है। चोर ऑटोवाला और जेबकतरा मियां ही है… वग़ैरह वग़ैरह। पिछले 20-30 साल में एक तरफ गांव गांव से तलाश कर भगवान टीवी के पर्दे पर लाये गये। कहानी घर घर की से लेकर तारक मेहता का चश्मा तक मज़हब के घोल सब-कांशिएन्स माइंड में ठूँसते रहे। लोगों को बताया गया कि क्या शुभ है, क्या अशुभ, क्या धर्म है क्या अधर्म। एक भी लिबरल ने नहीं कहा कि ये चाशनी मज़हब की है और ग़लत है। एजेंडा फ़िल्म बनीं… इनमें घर के भेदी, पाकिस्तान समर्थक, देशद्रोही और सेना के खिलाफ साजिश करने वाले सिर्फ मुसलमान ही दिखे। पाकिस्तान के बहाने एक पूरे वर्ग के ख़िलाफ़ बहुसंख्यकों के मन में ज़हर की खेती की गई।

आपको क्या लगता है, ये जो 6-7 साल के बच्चे जब कहते हैं मुसलमान अच्छे नहीं होते? जब युवा के लिए बेरोज़गारी से बड़ा मुद्दा मज़हब होता है? जब कोई मुसलमान होने भर से किराए पर मकान नहीं देता… या जब कोई लड़की हमसे कहती है सर आप थोड़े अलग ही, वरना मुसलमान को देख कर छिपना पड़ता है… ये सब किसने सिखाया?? मां बाप ने? शायद सिखाया हो, लेकिन उस से ज़्यादा ये डर सिनेमा और टीवी ने पैदा किया। सिनेमा या टीवी कभी कला रहे होंगे या आपके लिए अभी भी होंगे, मगर अब ये नफरत फैलाने और समाज को बांटने की मशीन हैं।

सिनेमा उद्योग खुद दो गुटों में बंटा है। एक जो ईद या दूसरे त्योहारों का मोहताज है। उसकी फिल्मों में सुपर हीरो कुटे पिटे मुस्लिम युवाओं की दमित भावनाओं को भुनाता है और दूसरा गुट इन्हीं मुसलमानों के ख़िलाफ़ ढकी छिपी नफरती भावनाओं को बेचता है। कुल मिलाकर फ़िल्म के केंद्र में, विषयो के केंद्र में और फिर नफरतों के केंद्र में मुसलमान है, जिसके मर्द पठान सूट, पहने, जाली वाली टोपी और आंख में सुरमा लगा कर अपराध करता है। उसकी महिलाएं बुर्का पहन कर अपराधी का साथ देती है या बुर्का फेंक कर बिकिनी पहनने का संघर्ष कर रही है।

इसके बीच में पढ़ा लिखा, सामान्य सा दिखने वाला, काम काजी, दफ्तर जाने वाला या स्कूल जाता मुसलमान तस्वीर से ग़ायब है। सिनेमा का मुसलमान सिर्फ मज़दूर है, अशिक्षित है, अपराधी है, समानता विरोधी है, ढकोसलेबाज़ है, विकास विरोधी है, देश विरोधी है और अगर शासक है तो हिंदुओं का दमन करने वाला है। मज़ेदार बात ये है कि इस सबके विरोध में देश भर में कहीं एक आवाज़ नहीं है।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

6 thoughts on “ज़ायरा पर गुस्सा होने से पहले सोचिए क्या आपने कभी इस पर गुस्सा दिखाया कि सिनेमा और टीवी सांप्रदायिकता क्यों परोस रहा है?

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