Home पड़ताल नज़रियाः भारत का असली दलित तो भारतीय मुसलमान है

नज़रियाः भारत का असली दलित तो भारतीय मुसलमान है

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वाहिद नसीम

दलित मतलब दला हुआ यानी जिसका दलन किया गया हो यानी जिसे दल कर पीसकर दाल की तरह चूर चूर कर दिया गया हो।  इस हिसाब से दलित शब्द आज की तारीख में मुसलमानों पर ज्यादा फिट बैठता है यानी आज सबसे बड़े दलित भारत में मुस्लिम ही है। यह सही है कि पिछले ढाई हजार सालों से एक कम्युनिटी को शूद्र बता कर उसका दलिती करण उसका दलन किया जाता रहा है।

दलितों के साथ होने वाले जुल्मों सितम मुस्लिम शासक भी मूक दर्शक बनकर देखते रहे मुस्लिम शासकों ने भी अपने शासनकाल में कभी दलितों की इस पीड़ा को नहीं समझा कि उन्हें वर्ण के आधार पर दासता के काम दिए जा रहे हैं यानी उन्हें सिर्फ दास समझा जाता रहा है और उन्हें कोई भी ऐसे काम की इजाजत नहीं दी गई जिसे तथाकथित उच्च जाति के लोग भारत में करते रहे हैं यही वजह है कि 1000 साल के शासन काल में भी दलित अपने ही धर्म के उस जाल से बाहर नहीं निकल पाए जिस का हवाला देकर दलितों पर जुल्म किए जाते रहे हैं।

उन्हें कपड़े कपड़े पहनने की मनाही का सामना करना पड़ा उन्हें कोई भी ऐसे काम करने का की इजाजत नहीं मिली जिसे आम भारतीय करता आया हो। हजारों हजारों साल दलितों के साथ जो होता आया है उसे रोकने के लिए बीच-बीच में बागी भी पैदा होते रहे हैं आवाज एक ऊंची होती रही फिर दमन भी हुए हैं डॉ भीमराव अंबेडकर ने आजादी के बाद एक बहुत बड़ा काम दलितों के लिए किया जिसमें आरक्षण शामिल था जिस के कारण आज उत्थान हम देख पा रहे हैं।

डा. भीमराव अंबेडकर ने एक चूक करदी, मुझे लगता है कि उन्होंने अपने ही धर्म में वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय खुद को बौद्ध घोषित कर दिया आज भी दलित समाज के लोग बौद्ध बनना मुस्लिम होना ईसाईयत अपनाना जैसी धमकी देते नज़र आते हैं। यह धमकी ठीक वैसे ही होती है जैसे कोई अपने घर को छोड़कर जाने की धमकी दे और यह उम्मीद लगाए घर के लोग उसको रोक लेंगे।

ऐसा इस लिए होता है क्योंकि दलित समाज के मस्तिष्क में भी पूरी तरह सनातन धर्म गहराइयों तक है। इसी कारण वह अपनी दास होने की धार्मिक श्रेणी दिल से मंजूर करता है। आज राजनीतिक पार्टी दलित भाइयों को नीचा दिखाने के लिए कुछ ऐसे कदम उठाती है जैसे दलितों के घर खाना खाना खाना खाते हुए खुद को टेलीविजन अखबारों तक पहुंचाना मंदिर में आने की इजाजत देना यह दोनों ऐसे काम है। जो साबित करते हैं की दलित छोटी जाती है। और बड़ी जाती वाले खाना खा कर उन पर एहसान कर रहे हैं। इस मानसिकता से निकले बगैर दलित शब्द शूल बना रहेगा।

मैं अपने विश्लेषण में अभी तक तो में यह समझ पाया हूं कि अगर हिंदू या मुस्लिम दलितों के साथ अपना गठबंधन मजबूत करना चाहते हैं तो अपने सामाजिक समारोह सामाजिक मूवमेंट में दलितों को सह सम्मान शामिल करके सामाजिक समारोह यह राजनीतिक समारोह का हिस्सा मानकर इस आदान-प्रदान को बढ़ाएं तो दूरियां कम हो सकती हैं।

घुटन कम हो सकती है और एक मजबूत समाज छुआछूत से परे समान भारतीय शसक्त समाज उत्पन्न हो सकता है। क्या मुसलमान भी इस पहल को करके साबित करेंगे कि वह चाहते हैं की दलित भी मुसलमानों को आमंत्रित करके ऐसा सबूत देने की कोशिश करेंगे ? हिंदू समाज ने दलितों को जोड़ने के लिए अलग श्रेणी के संगठन बनाकर उन से दलितों को जोड़कर अपने साथ जोड़ने का नाटक जरूर किया है मगर मुसलमानों और दलितों के बीच में सामाजिक उठ बैठ शून्य होने के कारण यह गठबंधन कभी मजबूत नहीं हो पाया। ज्ञात रहे जिसका दलन किया जा रहा है आज वः मुस्लिम है यानि मुस्लिम असली दलित मुस्लिम हुआ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ये उनके निजी विचार हैं)