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कोरेगांव हिंसाः आखिर भगवाधारी हमलावरों के उपद्रव और हिंसा पर मीडिया ने क्यों खामोशी बरती?

उर्मिलेश

भीमा-कोरेगांव की पेशवा-राज विरोधी निर्णायक लड़ाई में दलितों की उल्लेखनीय भूमिका की याद में दलित संगठनों द्वारा आयोजित शौर्य दिवस से नाराज़ मनुवादियों के एक भगवाधारी गिरोह ने दलित समुदाय के कुछ लोगों पर हमला कर दिया। इसमें अभी तक एक व्यक्ति के मारे जाने की सूचना है। कई दलित युवक बुरी तरह घायल हैं। समझा जाता है कि मनुवादियों के संगठित गिरोह के उकसावे पर ही मध्यवर्ती समुदाय के कुछ बिगड़ैल लोगों ने दलित विरोधी हिंसा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

लेकिन मुख्यधारा मीडिया के बड़े हिस्से ने शौर्य दिवस और उसके बाद दलितों पर मनुवादी गिरोहों के हमले की खबर तक नहीं दी। मंगलवार को जब दलित संगठनों ने मुंबई में प्रतिरोध प्रदर्शन किया तो कुछेक अंग्रेजी चैनलों ने खबर चलाई पर इन खबरों में भी दलितों को हिंसा और शांति भंग करने के आरोपी के तौर पर पेश किया। और कोरेगांव के हमलावरों पर ख़ामोशी!

आखिर भगवाधारी हमलावरों के उपद्रव और हिंसा पर उस दिन शासन और मीडिया ने क्यों खामोशी बरती? सच ये है कि उसी दिन शासन ने ठोस कदम उठाया होता तो मुंबई में आज दलितों के विरोध प्रदर्शन की नौबत ही नहीं पैदा होती!  मुंबई में आज 100 से अधिक दलित कार्यकर्ताओं के हिरासत में लिये जाने की खबर है। भीमा-कोरेगांव इलाके के भगवाधारी मनुवादी गिरोह के कितने सदस्य हिरासत में लिये गये थे?

हिंदी के ज्यादातर चैनल तो इस खबर पर देर शाम तक खामोश रहे। एक चैनल खबर चलाता रहा ‘कोरेगांव में हिंदुओं और दलितों के बीच हिंसा!’ कितनी शर्मनाक हरकत है यह! फुटेज देखने से भी साफ होता है कि वह मनुवादी भगवा ब्रिगेड का दलितों पर हमला था। हमलावर एक खास तरह का झंडा लिये हुए थे।  आखिर हमारा मीडिया ऐसा क्यों करता है? मंगलवार को भी हर शाम की तरह वह एक ही तरह का भजन गाता नजर आया। वह मृदंग की तरह बज रहा था!

हमारा मीडिया इस कदर एकतरफा क्यों होता गया है? इसका जवाब हमारे ‘मीडिया के बादशाह’ नहीं देंगे क्योंकि वे इस सच को छुपाते हैं कि भारतीय मीडिया के निर्णयकारी पदों पर 88 फीसदी से ज्यादा लोग एक ही वर्ण के हैं! उनमें ज्यादातर ‘पेशवाई मानसिकता’ के हैं। संविधान की मजबूरी है कि 200 साल पहले के अपने पूर्वजों की तरह नंगी क्रूरता नहीं दिखा पाते। पर छल और चालबाजी से वही सब करते हैं! विविधता के अभाव में भारतीय मीडिया ऐसे मामलों में नंगी पक्षधरता दिखाता है! सिर्फ दलितों के खिलाफ ही नहीं, किसानों, मजदूरों, ओबीसी और आदिवासियों के खिलाफ भी!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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