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टॉम अल्टरः वह ‘गौरा’ मगर ‘देशी’ शख्स जिसे भारत के सेकुलरिज्म से बहुत लगाव था।

अली जाकिर

चर्चित अभिनेता, लेखक और पद्मश्री टॉम ऑल्टर का शुक्रवार रात 67 साल की उम्र में निधन हो गया, टॉम ऑल्टर फिल्मी पर्दे पर इंग्लिस्तान की ख़ूबसूरत निशानी थे। उनका अभिनय यादगार रहा है। थियेटर को लेकर टॉम अल्टर का योगदान रंगकर्मी भुला नहीं पायेंगे।

उन्हें उनके नाम से भले सभी न जानते हों, लेकिन ‘वो अंग्रेज एक्टर’ कहते ही सभी के जहन में एक ही चेहरा उभरता है, टॉम ऑल्टर का. चेहरा अंग्रेज और जुबान हिंदी-उर्दू में इतनी नजाकत से की सुनने वाले सुनते ही रह जाएं. वह भारतीय सिनेजगत में ऑफबीट कैरेक्टर्स के मेनस्ट्रीम एक्टर थे.

रंगमंच पर उनके एकल नाटकों के लिए उन्हें विशेष ख्याति मिली, जिसमें मशहूर शायर मिर्जा गालिब पर इसी नाम के प्ले और मौलाना अबुल कलाम आजाद पर आधारित प्ले ‘मौलाना’ में निभाए उनके एकल अभिनय को हमेशा याद रखा जाएगा. उत्तराखंड के मसूरी में जन्मे टॉम के नाम 250 से अधिक फिल्में हैं. उन्होंने सत्यजीत रे से लेकर श्याम बेनेगल तक भारतीय फिल्म जगत के लगभग सभी चोटी के निर्देशकों के साथ काम किया.

टॉम ने फिल्म ‘चरस’ से फिल्मी सफर शुरू किया और उसके बाद शतरंज के खिलाड़ी, देश-परदेश, क्रांति, गांधी, राम तेरी गंगा मैली, कर्मा, सलीम लंगड़े पे मत रो, परिंदा, आशिकी, जुनून, परिंदा, वीर-जारा, मंगल पांडे जैसी फिल्मों में निभाए किरदारों ने उन्हें हमेशा के लिए भारतीय सिनेमा का स्थायी अभिनेता बना दिया.

उन्होंने कई बेहद लोकप्रिय धारावाहिकों में भी काम किया, जिसमें भारत एक खोज, जबान संभालके, बेताल पचीसी, हातिम और यहां के हैं हम सिकंदर प्रमुख हैं. आज के दौर में टॉम की वह बात सबसे यादगार है, “मैं कोई गोरा नहीं, बल्कि एक देसी आदमी हूं और मुझे भारत में धर्मनिरपेक्षता यहां की सबसे अच्छी बात लगती है.”

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं)

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