Home पड़ताल नज़रियाः समाजवाद को जया बच्चन की नहीं शरद यादव जैसे खांटी लोगों...

नज़रियाः समाजवाद को जया बच्चन की नहीं शरद यादव जैसे खांटी लोगों की जरूरत है।

SHARE

नज़ीर मलिक

समाजवादी वोट खेत और खलिहानों में है। अभिजाज्य वर्ग के एयरकंडीशन बंगलों में नहीं। लेकिन इधर कुछ दिनों से समाजवादी पार्टी अपना वोट बंगलों और रंगमहलों में तलाश रही है। कभी नरेन्द्र मोहन जैसे पूंजीपति को राज्य सभा भेजती है तो कभी जयप्रदा को लोकसभा का टिकट देती है। जया बच्चन जी का हाल यह है कि वह अपने पति, बेटे व बहू तक का वोट साइकिल कि निशान को नहीं दिला पातीं, फिर भी उन्हें निरंतर राज्यसभा में बैठाया जाता है।

यह गलती नेता जी ने अमर सिंह की राय से की थी और अखिलेश यादव उसके प्रतिकार के बजाये उस पालिसी को आगे बढ़ा रहे हैं। मगर उन्हें सोचना चाहिए कि समाजवाद खेत खलिहोनों से जुडे लोगों के बीच ही पैदा होकर फल देगा। आज समाजवाद को जया बच्चन की नहीं शरद यादव जैसे खांटी लोगों की जरूरत है।

अगर अखिलेश ने सुविधा की इस राजनीति का त्याग नहीं किया तो भले ही वह एक आध बार सरकार बना लें लेकिन समाजवाद की जमीन को उर्वरा न बना सकेंगे। आज सपा को नाचने गाने वाले अभिजात्य टीम की नहीं खांटी गंवई टीम की जरूरत है। लेकिन यह भी जानते हैं कि सपाई समाजवादवाद जिस रास्ते पर चल पड़ा है, उससे वापस लौटना तकरीबन ननमुमकिन है।

क्रान्ति की मशाल और और सिसोदिया वंश

राणा कुंभा सिसोदिया वंश के प्रथम शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने कई राजपूत राज्यों को जीत कर अपने राज्य में मिलाया था। उन्होंने 1433 राणा मोकल से सत्ता हासिल की थी। 1468 में राणा कुभा की उनके ही बेटे उदय सिंह प्रथम ने तब हत्या का दी, जब वो मंदिर में पूजा कंर रहे थे। कुंभा ने भी अनेक परिजनों की हत्यायें की थीं।

उदय सिंह प्रथम अभी सत्ता ठीक से संभाल भी नहीं पाये थे कि उनके भाई रायमल ने उदय सिंह प्रथम की हत्या कर दी और गद्दी पर अधिकार कर लिया। की मौत के बाद। रायमल की मौत या हत्या(?) के बाद उनके तीन पुत्रों में उत्तराधिकार की जंग हुई। उनमें पृथ्वीराज और जयमाल की हत्या के बाद 1509 में भतीसरा भाई राणा सांगा गद्दी पर बैठा। खानवा में बाबर से पराजय के साल भर के भीतर उसके परिजनों ने 1527 के सत्ता संघर्ष में उसे जहर देकर मार डाला।

राणा सागा की मौत के बाद राणा बनबीर ने कितना खूनखराबा किया फिर उदय सिंह गद्दी पर बैठा। उदय सिंह कि मौत के बाद घोषित उत्तराधिकारी जगमाल को पिता का शोक मनाते वक्त राणा प्रताप और उनके लोगों ने बंदी बना कर सत्ता हथियाया बाकी अमर सिंह का समर्पण और दुर्गादास राठौर का भागना सब जानते ही है। यह सारे किस्से वैसे ही हैं जैसे उसी काल में भारत के मुगलों के थे कि येन केन प्रकारेण सत्ता के लिए कुछ भी करो।

सवाल है कि इस तरह का इतिहास बनाने वाले घरने को अथवा उस घराने के किसी सदस्य को क्रान्तिकारी कैसे माना जा सकता है। मेरे एक संघ के विचारक मित्र उन्हें क्रान्तिकारी मानने पर तुले हैं। हमारा कहना है कि राणा कुंभा, राणा सांगा और राणा प्रताप बहादूर और योद्धा तो हो सकते हैं, मगर वे साम्राज्यवाद के शत्रु और जनता की आवाज बनने वाले क्रान्तिकारी कैसे हो सकते हैं। जबकि वे खुद साम्राज्यवादी थे।

अपने से हर कमजोर राजा को हरा कर उसका राज अपने राज में मिलाने वाला शासक क्रान्तिकारी कैसे हो सकता है? दोस्तो मैने क्रान्ति विषयक जितने भी अध्ययन किये हैं, उसमें कोई भी परिभाषा ऐसी नहीं मिलती, जिसके आधार पर सिसोदिया वंश के किसी शासक काे क्रात्किारी साबित जा सके। लेकिन संघ विचारक मित्र ऐसा दावा करते हैं। क्या कोई मित्र इस बारे में मदद कर सकते हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)