Home खेल फ़िलिप ह्युजस: क्रिकेट जगत का वो सितारा जो बेवक्त ही बुझ गया

फ़िलिप ह्युजस: क्रिकेट जगत का वो सितारा जो बेवक्त ही बुझ गया

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साकिब सलीम

सागर से उभरी लहर हूँ मैं सागर में फिर खो जाऊँगा

मिट्टी की रूह का सपना हूँ मिट्टी में फिर सो जाऊँगा

ये शब्द आज से कोई चालीस बरस पहले कहे तो महान उर्दू शायर साहिर लुधियानवी ने थे, पर ये आज मुझे फ़िलिप ह्युजस को याद करते हुए उन पर सटीक मालूम दे रहे हैं. आज भारत-श्रीलंका टेस्ट मैच के शोर में हम में से कितने लोगों को याद है की 27 नवंबर क्रिकेट के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक है. आज से तीन साल पहले आज ही की तारीख़ को सिडनी के सैंट-विन्सेंट हॉस्पिटल में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ ‘फ़िल ह्युजस’ मौत से ज़िन्दगी की लड़ाई हार गए थे.

फ़िल ह्युजस जो की ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के सदस्य भी थे 25 नवंबर, 2014 को ऑस्ट्रेलियाई घरेलू प्रतियोगिता ‘शेफ़ील्ड शील्ड’ में साउथ ऑस्ट्रेलिया की ओर से न्यू साउथ वेल्स के विरुद्ध 63 रन पर बल्लेबाज़ी कर रहे थे. तभी तेज़ गेंदबाज़ सीन अबोट की एक बाउंसर को हुक करते हुए ह्युजस से चूक हुई और गेंद उनके कान के नीचे जा कर लगी. वो सिडनी क्रिकेट ग्राउंड की पिच पर गिर पड़े. उनकी चोट को डॉक्टरों ने एक दुर्लभ किस्म की चोट बताया जिसको ‘वर्टिब्रल आर्टरी डिसेक्शन’ कहा जाता है.

टीम के डॉक्टर की मानी जाये तो ये चोट लिखित इतिहास में 100 से अधिक लोगों को नहीं लगी है और गेंद से पहली दफ़ा ये चोट किसी को लगी थी. 2 दिन तक कोमा में रहने के बाद 27 नवंबर को हेमरेज के कारण उनका हॉस्पिटल में निधन हो गया. वे तब अपना छब्बीसवां जन्मदिन मनाने से केवल 3 दिन दूर थे.

ह्युजस एक टैलेंटेड बायें हाथ के बल्लेबाज़ थे. बीस वर्ष की कम आयु में ही उनको 2009 में मेथिऊ हेडन जैसे महान बल्लेबाज़ की जगह ऑस्ट्रेलियाई टीम में जगह दी गयी थी. साउथ अफ्रीका जैसी मजबूत टीम के विरुद्ध पहले टेस्ट की दूसरी पारी में तेज़ तर्रार 75 रन बना कर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगमन की घोषणा कर दि थी. परन्तु उनको टीम में हेडन की जगह चुने जाने का फ़ैसला कितना सही है ये दूसरे टेस्ट में साबित होना बाक़ी था.

अपने दूसरे टेस्ट में डरबन की तेज़ पिच पर डेल स्टेन जैसे गेंदबाज़ के होते उन्होंने पहली पारी में 115 रनों की पारी खेलते हुए ऑस्ट्रेलिया की ओर से सबसे कम उम्र में शतक का कीर्तिमान बनाया. उनकी उम्र तब 20 वर्ष और 96 दिन थी. इस ही मैच की अगली पारी में ह्युजस ने 160 रन बना डाले और एक ही मैच की दोनों पारियों में शतक जड़ने वाले सबसे युवा बल्लेबाज़ बन गये.

अपने पहले एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच में ही शतक लगाने वाले वो पहले ऑस्ट्रलियाई बल्लेबाज़ हैं.  ये रिकॉर्ड केवल ये बताने के लिये साझा कर रहा हूँ ताकि अंदाज़ा हो सके की इस अनहोनी से क्रिकेट जगत ने क्या खोया.  वैसे तो ये पूरे क्रिकेट जगत के लिये ही एक मुश्किल घडी थी परन्तु ऑस्ट्रेलिया के लिये ये भारी इम्तेहान था. जिस दिन ह्युजस को चोट लगी ऑस्ट्रेलिया में बाक़ी जगह चल रहे सभी घरेलु मैच स्थगित कर दिये गए थे.

ऑस्ट्रेलिया में खेलते हुए सभी 6 घरेलु टीमों के सदस्य सिडनी में हॉस्पिटल पहुंच गए थे. ह्युजस के अंतिम क्षणों में 86 क्रिकेटर उनके बिस्तर के आसपास मौजूद थे. ऑस्ट्रलियाई प्रधान मन्त्री ने इसे एक राष्ट्रीय क्षति कहा था, वहीँ दूसरी ओर ऑस्ट्रलियाई क्रिकेट कप्तान माइकल क्लार्क ये ख़बर प्रेस को देते हुए अपने आंसू नहीं रोक पाये थे. तब से अब तक अपने कई साक्षात्कारों में क्लार्क ये जता चुके हैं की ह्युजस की मृत्यु उनको अन्दर से तोड़ चुकी है और वे हरदम एक ख़ालीपन महसूस करते हैं.

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने इस पर एक जांच समिति भी बिठाई. जिसने माना की इसमें गेंदबाज़ की कोई ग़लती नहीं थी. जांच ने ये भी पाया की गेंदबाज़ अबोट अपराधबोध के चलते मानसिक तनाव में पहुँच चुके हैं.  इस दुर्घटना के बाद ये मांग भी उठती रहीं की बाउंसर को पूरी तरह अवैध क़रार दिया जाये जिसका पूर्व क्रिकेटरों जैसे की गिल्लेस्पी आदि ने विरोध भी किया.  शायर ख़लील रामपुरी के शब्दों में बस इतना ही कह सकते हैं;

हादिसा ऐसा भी पेश आएगा मर जाऊँगा

ख़्वाब ऐसा तो कभी उम्र में देखा ही न था

(लेखक स्वतन्त्र टिपण्णीकार हैं)