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नज़रियाः समाजिक न्याय की लड़ाई में मुसलमान तो दलितों के साथ हैं, मगर क्या दलित मुसलमानों के साथ आयेंगे ?

रेहान हाशमी

गुजरात के ऊना से लेकर सहारनपुर के चंद्रशेखर रावण पर हुए ज़ुल्म के खिलाफ मुसलमान सोशल मीडिया से लेकर ज़मीन पर मुखर रहा जिसका नतीजा ये निकला कि शंभूलाल नाम के दलित ने राजस्थान में एक मुसलमान को ज़िंदा जला दिया ये अलग बात है कि हिन्दूवादी आतंकी शंभूलाल रेगर का जहां हिन्दुवादियों ने जबरदस्त समर्थन किया वहीं कोई भी दलित संगठन आतंकी रेगर के समर्थन में नही आया।

दरअस्ल मुसलमान का दिल बहुत नर्म होता है वह ज़ुल्म बर्दाश्त नही कर पाता इसीलिए अपने ऊपर हुए ज़ुल्मो सितम को भूल कर क़ूद पड़ता है दूसरे के लिए लड़ने. बस चूक यहीं हो जाती है वो भूल जाता है कि वो लड़ किसके लिए रहा है  साथ किसके खड़ा है,  भारत का इतिहास गवाह है कि मुसलमानों को सबसे ज़्यादा लूट मार क़त्ल बलात्कार का शिकार दलितों को हिन्दुत्व की चाशनी में डुबोलकर दलितों से कराया गया है। लेकिन कोई कितना भी ज़ुल्म करे वो आखिर में आकर शंभूलाल रैगर बन जाता है, लोग फिर ये कहते हैं कि उनको भड़काया जाता है, नफरत भरी जाती है।

सवाल यह है कि सारी नफरत इन दलितों के अंदर ही क्यों भरी जाती है ? इसका सीधा सा जवाब है कि इस देश का ब्राह्मण राजपूत बहुत शातिराना तरीके से दलितों को मुससमानों के खिलाफ भड़काता है इससे उसके एक तीर से दो निशाने सध जाते हैं एक वह मुस्लिम से लड़कर या तो खुद मरता है या फिर उसे मार देता है इससे या तो वह मरेगा या जेल में सड़ेगा।

हिन्दुवादी देश के दलितों और ओबीसी को हिन्दुत्व का लठैत बनाकर पेश करता है, सवाल है कि ऐसे में दलित चिंतक कहां चले जाते हैं जब एक शंभू रेगर या अशोक मोची मुसलमानों के घरों को जलाता है तब उसे क्यों नहीं याद दिलाया जाता कि जिसके वह घरों को जला रहा है समाजिक न्याय की लडाई में यही मुसलमान उसके साथ रहा है। जरूरत है कि जब जब मुसलमानों के साथ इस देश में अत्याचार हो तब तब इस देश के दलितों को मुसलमानों के साथ वैसे ही खड़े हो जाना चाहिये जिस तरह मुसलमान दलितों के साथ खड़ा होता है।

(लेखक युवा टिप्पणीकार हैं)

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