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गालीबाजों पर रवीश का तंज ‘मां बाप सोचते थे बेटा बड़ा होकर अच्छा काम करेगा मगर बेटा तो नेता के चक्कर में गालीबाज बन गया’

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रवीश कुमार

भारत की राजनीति में फ़तवा का विरोध तीन दशक तक इतना सघन रूप से किया गया कि अब उस पर बात भी नहीं होती। इस पर बात होती है कि मुस्लिम वोट बैंक मिथक से ज़्यादा कुछ नहीं। मुसलमान किसी एक दल को वोट नहीं करता है। बीजेपी को भी करता है। फ़तवा देने वाले चेहरे राजनीति से ग़ायब हो गए। यह अच्छा ही हुआ मगर अब फ़तवा दूसरे खेमे में उभर रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की यह ख़बर बताती है कि खेड़ा ज़िले में एक प्रभावशाली और प्रतिष्ठित संप्रदाय के महंत ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में अपने भक्तों से कहा कि बीजेपी को वोट दें। इसमें अगर किसी को ग़लत नहीं लगता तो वो भी ठीक है मगर फिर कोई लेक्चर न दे कि जाति और धर्म से ऊपर उठ कर राजनीति कर रहे हैं। मंदिरों मठों के पुजारियों का पाँव छूकर वोट मांगना बता रहा है कि सब कुछ दैवी कृपा से ही हो रहा है।

इसमें किसी मॉडल या विकास का योगदान कम ही है। यह ख़तरनाक प्रवृत्ति है। आप गाली देकर सही ठहरा सकते है लेकिन धार्मिक गोलबंदी आपको कट्टर बनाती रहेगी। कट्टरता हमेशा ग़रीब और पिछड़ा बनाए रखती है। ठीक से सोचिए। प्रधानमंत्री तो हिमाचल में कहते हैं कि हिमाचल के नौजवानों को कश्मीर में पत्थर से मारते हैं। कल वे चुनाव जीतने के लिए बिहार के जवान बोलेंगे फिर धर्म का नाम लेने लगेंगे।

गाली देन वालों के चक्कर में मत पड़िए। उनका दुर्भाग्य देखिए। माँ बाप ने कितनी उम्मीदों से पाला होगा कि बड़ा होकर कुछ अच्छा काम करेगा, मगर लड़का एक नेता के चक्कर में गाली देने वाला बन गया। इस लिंक को चटकाइये और पढ़िए। ये सब क्यों हो रहा है? क्या कुछ काम नहीं हुआ है? क्या विकास से चुनाव नहीं जीता जा सकता ? गुजरात का चुनाव पहले से फिक्स बताकर दिन रात फिक्स किया जा रहा है।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)