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नज़रियाः जो गांधी, जिन्ना और अंग्रेज नहीं देख पाए, उसे वर्षों पहले मौलाना आज़ाद ने देख लिया

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राजीव शर्मा कोसिया

लोकतंत्र में एक अच्छे राजनेता के लिए बेहद जरूरी है कि वह दूरदर्शी हो। अगर आज़ादी के आंदोलन में शीर्ष नेताओं की बात करें तो मैं सबसे ज्यादा दूरदर्शी तीन नेताओं को मानता हूं — सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस और मौलाना आज़ाद। खासतौर पर मौलाना आज़ाद के ऐसे कई भाषण और लेख मौजूद हैं जिन्होंने आज़ादी से पहले ही यह बता दिया था कि तीस साल बाद पाकिस्तान की तस्वीर कैसी होगी।

जब विभाजन की बात तय हो गई और कई बड़े—बड़े मुस्लिम नेता जिन्ना के पाले में जा रहे थे तब मौलाना साहब सिर्फ महात्मा गांधी और नेहरूजी के साथ रहे। उनका मानना था कि भारत से अलग हमारा न तो कोई इतिहास है और न कोई भविष्य। मौलाना साहब की दूरदर्शिता का मैं कायल हूं। जो बात उस समय ब्रिटिश शासक, कांग्रेस के दिग्गज नेता, पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना भी नहीं सोच सकते थे, वह उन्होंने अपनी सूझबूझ से पहले ही बता दी थी।

बीबीसी हिंदी के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, मौलाना आज़ाद ने 1946 में कहा था — नफ़रत की नींव पर तैयार हो रहा यह नया देश (पाकिस्तान) तभी तक ज़िंदा रहेगा जब तक यह नफ़रत जिंदा रहेगी, जब बंटवारे की यह आग ठंडी पड़ने लगेगी तो यह नया देश भी अलग-अलग टुकड़ों में बंटने लगेगा।

यही नहीं, उन्होंने आगे कहा था — यह देश एकजुट होकर नहीं रह पाएगा, यहां राजनीतिक नेतृत्व की जगह सेना का शासन चलेगा, यह देश भारी कर्ज़ के बोझ तले दबा रहेगा, पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के हालातों का सामना करेगा, यहां अमीर-व्यवसायी वर्ग राष्ट्रीय संपदा का दोहन करेंगे और अंतरराष्ट्रीय ताकतें इस पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिशें करती रहेंगी। … वह वक्त दूर नहीं जब पाकिस्तान में पहले से रहने वाले लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान के लिए उठ खड़े होंगे और भारत से वहां जाने वाले लोगों से बिन बुलाए मेहमान की तरह पेश आने लगेंगे।

उन्होंने भारत के मुसलमानों से बार—बार कहा था — भले ही धर्म के आधार पर हिंदू तुमसे अलग हों लेकिन राष्ट्र और देशभक्ति के आधार पर वे अलग नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में तुम्हें किसी दूसरे राष्ट्र से आए नागरिक की तरह ही देखा जाएगा। वर्ष 1948 में उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों से भाषण दिया और पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों को कहा था — अगर तुम बंगाल में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे, अगर सूबा—ए—पंजाब में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे, अगर सूबा—ए—सरहद और बलोचिस्तान में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे। अरे तुम सूबा—ए—सिंध में जाकर भी आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी ही कहलाओगे।

आज हम पिछले 70 साल के घटनाक्रम को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि उनकी बातों में किस हद तक सच्चाई थी! यह बात और है कि उनसे शिक्षा लेकर हम अपना राष्ट्रीय चरित्र बनाने में विफल रहे हैं। हकीकत यही है कि वोटों की राजनीति में जो व्यक्ति मुसलमानों को हक दिलाने के नाम पर नेता बनता है वह सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों का ही करता है।

जो व्यक्ति दलितों का हमदर्द बनकर आगे आता है, वह सिर्फ अपना घर बनाता है। असली दलित और शोषित तो आज भी दुर्गति के शिकार हैं। यही नहीं, जो कोई हिंदुओं का रक्षक बनकर नेता का रूप धरता है, इतिहास गवाह है वह सबसे ज्यादा हानि हिंदुओं को ही पहुंचाता है। ये लोग सिर्फ सियासी सौदागर हैं जिन्हें वोटों की लहलहाती फसल चाहिए और हर कीमत पर चाहिए।

आज भी नगर—नगर द्वार—द्वार धर्म और जाति की राजनीति करने वाले नेता घूम रहे हैं, जिन पर फौरन प्रतिबंध लगना चाहिए। अगर जापान या चीन जैसे मुल्क में भी ऐसी घटनाएं होतीं तो वे लोग इस किस्म की राजनीति को रोकने के लिए कसम खा लेते लेकिन हम भारत के लोगों ने प्रतिज्ञा कर रखी है कि इतिहास से कभी कोई सबक नहीं लेंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)