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चेहरे- कभी ये साहेबान महफिलों की जान होते थे, लेकिन अब न हंसते हैं न रोते हैं

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डॉ. रूद्र प्रताप दूबे

कभी ये साहबान महफिलों की जान होते थे,
बहुत दिन से ये सारे पत्थर हैं, न हंसते हैं न रोते हैं।

तस्वीर में शामिल हर शख्स जनता का बेहद पसंदीदा रहा है। इन सबके घरों में हजारों सम्मान, प्रशस्तिपत्र और यादें रहती हैं लेकिन नहीं है तो सिर्फ इनकी आवाजें…और ऐसा होना इसलिए सबसे बुरा है क्यूंकि ये लोग अपनी आवाज़ (भाषण, तरन्नुम, अभिनय) से ही कभी राज़ किया करते थे!

अटल बिहारी बाजपेयी जी अब सिर्फ देखते हैं..देर तक एक आदमी को देखते रहते हैं वो भी बिना किसी भाव के ! कभी छोटे मकान में ही उनसे मिलने वालों की लाइन लगी रहती थी और आज वो एक बड़े मकान में भी तनहा हैं..उनकी याददास्त भी उनके साथ नहीं रहती।

अपने जोरदार भाषणों से सरकारों की नींद उड़ा देने वाले जॉर्ज फर्नांडीज़ साहब अपने बिस्तर की सिलवटें भी नहीं सही कर पाते। उनकी जबान सिर्फ हिलती है, उससे आवाज़ नही निकलती. वो एक बड़े मकान में भी तनहा हैं..उनकी याददाश्त भी उनके साथ नहीं रहती।

दिलीप कुमार साहब आज खुद की हस्ती से बेनियाज हो गए हैं। कभी अपने रोने से पूरे भारत को रुला देने वाले दिलीप साहब अब ठीक से रो भी नहीं पाते। अभी जल्दी ही व्हील चेयर पर बैठे हुए उन्होंने हाथों में माइक पकड़ा, कुछ कहने के लिए होंठ कई बार हिले भी पर जुबां की जगह सिर्फ आँखें ही चलती रहीं।

नज्मों के बादशाह डॉ. बशीर बद्र से एक बार किसी मुशायरे में शायर अहमद फराज ने कहा था कि ‘बशीर साहब, सिर्फ सुनाना ही नहीं, सुनना भी सीखिए।’ बशीर बद्र साहब अब कुछ नहीं सुना पाते, सिर्फ सुनते रहते हैं। उन्हें अपने शेर भी याद नहीं, अब वो सिर्फ सुनते हैं और हँसने वाले हर शख्स को देख कर सिर्फ हँस देते हैं।

ये सभी लोग सिर्फ एक नाम नहीं हैं- एक नज़रिया हैं, भाव हैं, विचार हैं लेकिन अब बेआवाज़ हैं। जिन्दगी कभी-कभी आपकी सबसे बड़ी ताक़त पर वार करती है और इन सभी महान हस्तियों के साथ वही हुआ है।

(लेखक पत्रकारिता से जुड़े हैं)