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गोरखपुर महोत्सवः योगी जी जरूर सोचियेगा कि अखिलेश आपसे इतने ज्यादा बेहतर क्यों हैं ?

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नज़ीर मलिक

सैफई महोत्सव और गोरखपुर महोत्सव कोई अंतर नहीं है, सिवाय इसके कि सैफई महोत्सव कुछ पाखंडी सियासतदानों की नजर में जनता के धन की बरबादी और सपाइयों की ‘सियासी एेयाशी” थी। मजे कि बात यह है कि जो पाखंडी उसे “सियासी ऐयाशी” बता रहे थे, वही आज इस ऐयाशी को दुगने जोश से अंजाम दे रहे हैं। सैफई में जहां इस पर आठ करोड खर्च हाेते थे, वहीं सूत्र बताते हैं कि योगी जी के शहर में इस पर तैंतीस करोड खर्च हो रहे हैं।

गोरखपुर में भोजपुरी नृत्य हो रहा है, कहना न होगा कि आजकल के भोजपुरी नृत्यों का स्वरूप क्या है। यही नहीं यहां विश्वामित्र की तपस्या भंग करने वाला अपसरा नृत्य हो रहा है। सोचिए यह नृत्य कितना रोमांचक होगा?

एक रोचक तथ्य यह है कि सैफई में धूम्रपान के प्रचार प्रसार पर सख्त पाबंदी थी लेकिन गोरखपुर में इसके प्रायोजकों को खुली छूट है।बहरहाल यह संस्कारवादी जमात सपा काल के हर महोत्सव को संस्कृति पर खतरा बताती थी, मगर आज उसी खतरे को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उज्जव नक्षत्र बना कर गोरखपुर के क्षितिज पर चमका रही है। इस लिहाज से तो आप समाजवादियों से भी गये गुजरे हैं हुजूर।

इस शहर में इसी साल 450 बच्चों ने चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव दम तोड़ा है। इसके बावजूद आप उनकी गर्म चिताओं को नजर अंदाज कर महोत्सव मना रहे हैं। जरा सोचिए, मुलायम सिंह यादव ने सैफई जैसे गांव को कहां से कहा पहूंचा दिया तब महोत्सव का आयोजन शुरू किया और आप?

आप तो गोखपुर में विकास की एक ईंट भी नही रख सके। इसके उलट आपने उन 450 मासूमों की चिता की राख भी ठीक से ठंडी न होने दिया। जरा सोचिए, अखिलेश आपसे कितने बेहतर हैं जो कहते हैं कि उन्हें गोरखपुर महोत्सव होने पर कोई ऐतराज नहीं, ये उनका अपना फैसला है। यही वह सोच है जो समाजवादी राजनीति को आपके पाखंडवाद से अलग करती है।

(लेखक कपिलवस्तू वेबपोर्टल के संपादक हैं)