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नज़रियाः फतवों को लेकर भारतीय मीडिया बौरा गई है, वह रचनात्मक के बजाय सांप्रदायिक हो गई है

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नज़ीर मलिक

भारत की मीडिया बौरा गई है। वह फतवों को लेकर रचनातत्मक होने के बजाए साम्प्रदायिक अधिक दिखती है। वह ऐसी कोई बहस नही चलाती जिसे आम मुसलमान यह समझ सके कि बदले वक़्त में फतवे की प्रासंगिकता भी बदल गई है। कभी फतवा प्रासंगिक था। तब लोगों को अरबी भाषी किताब के निर्देशों की जानकारियों के बारे में कम पता था, लिहाजा किसी धार्मिक मसले पर पेंच फंसने पर राय मांगने का निर्देश था, जिसे फतवा कहा जाता है। इसके लिए मुफ़्ती की डिग्री धारी धार्मिक आलिम ही अधिकृत था और है। लेकिन मीडिया ने भारत के लोगों के दिल दिमाग में फतवे की खतरनाक धारणा फिट कर दी।

भारत की मीडिया ने इस खेल की शुरुआत सबसे पहले दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्लाह बुखारी को लेकर की। बुखारी के राजनीतिक बयानों को फतवा करार देकर ध्रुवीकरण की राजनीति को मजबूत करने की शुरुआत की। जबकि सच ये है कि अब्दुल्लाह बुखारी मुफ़्ती नही थे सो वे फतवा देने के अधकारी भी नहीं थे फिर भी मीडिया उनके बयान को खतरनाक ढ़ंग से फतवा करार दे कर गैर मुस्लिम समाज को डराती रही। डराने वाला ये खेल आज भी जारी है।

आपको डेढ़ साल पहले का असम का किस्सा याद होगा। एक मुस्लिम लड़की के संगीत प्रोग्राम का स्थानीय कारणों से वहां के कुछ मुसलमान मौलवी ने विरोध किया और एक पम्पलेट भी बांटा। भारत की मीडिया ने इसे फतवा बता कर किस तरह तूफान मचाया ये याद ही होगा।

इसी तरह बगाल के एक मौलवी के बयान को भी फतवा बता कर पिछले साल किस तरह बंगाल का माहौल खराब करने की कोशिश की गई, ये किसी से छुपा नही है। मीडिया की साम्प्रदायिकता का यह हाल है कि वो किसी भी आम मौलवी की बकवास को फतवा बता कर लगातार माहौल खराब कर रही है।

इस मामले में हिंदी अखबारों का ट्रैक खराब ही नही शर्मनाक भो है। दरअस्ल मीडिया किसी वास्तविक फतवे की रचनात्मक आलोचना करने या उस पर एकेडमिक विमर्श के बजाए देश मे सामाजिक गोलबंदी का माहौल बना रही है जो बेहद खतरनाक है। देश को इसे समझना होगा।

(लेखक कपिलवस्तू वेबपोर्टल के संपादक हैं)