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नज़रियाः पद्मावत सिर्फ एक मूवी ही नहीं ब्लिक ब्रेन वॉश करने का आसान रास्ता है, जो सिर्फ नफरत की तरफ जाता है।

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नदीम अख़्तर

पदमावती या पदमावत सिर्फ़ एक मूवी नही है , यह एक कोशिश है जो असल मे एक साज़िश है, झूठे इतिहास को पर्दे पर उतारने की, क्योंकि लिखित इतिहास मे न तो इस दर्जे का झूठ लिखा गया है, न उसे कोई पढ़ता है न वो दिमाग़ों पर इतना असर छोड़ता है। यह एक सीरीज़ शुरू हुई है इसी तरह की और भी मूवीज़ आयेंगी जिनमें बाबर के हिन्दुस्तान आने का मक़सद सिर्फ़ मंदिरें तोड़ना और बाबर को सिर्फ़ मंदिरे तोड़ता दिखाया जाएगा, अकबर पर मूवी बनेगी तो उसे हल्दीघाटी मे हारते हुए दिखाया जाएगा और दिखाया जाएगा कि जोधा ने अकबर से विवाह करने के लिए अकबर के सामने हिन्दू धर्म स्वीकार करने की शर्त रखी थी और अकबर ने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था और जोधा ने ही शासन चलाया।

शाहजहां पर मूवी बनेगी तो आप देखने के लिए तैयार रहें कि शाहजहां की नज़र पहले से बनी एक ख़ूबसूरत इमारत पर पड़ी जिसे उसने ‘ताजमहल’ का नाम दिया और अपनी बीवी मुमताज़ को तोहफ़ा मे दे दिया। औरंगज़ेब पर मूवी बनेगी तो क्या क्या दिखाया जाएगा यह आप समझ सकते हैं लेकिन यह ज़रूर दिखाया जाएगा कि उसकी बहन को किसी हिन्दू से प्यार हुआ, शाहजहां अपनी बेटी की शादी उस हिन्दू से करना चाहता था इसीलिए औरंगज़ेब ने अपने बाप शाहजहां को क़ैद कर लिया।

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को बूढ़ा अय्याश दिखाया जा सकता है जो अंग्रेज़ों से नई लड़कियां मांगता था और मक़सद पूरा होने तक अंग्रेज़ देते भी रहे फिर बहादुर शाह ज़फ़र को ख़ुदकुशी करते या ज़्यादा शराब पीने की वजह से मरते दिखा देंगे। इस सीरिज़ की आख़िरी मूवी बनेगी जिसमे संघ के स्वयंसेवको को स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते दिखाया जाएगा और दिखाया जाएगा कि जब स्वयंसेवक इसे आज़ाद कराके ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने ही वाले थे तो कांग्रेस ने अंग्रेज़ों से मिलकर एक टुकड़ा मुसलमानों को दे दिया और दूसरे हिस्से पर अंग्रेज़ों की मर्ज़ी और शर्तों के मुताबिक़ सरकार बना ली, दिखाया जाएगा कि जिन्ना और नेहरू ने साज़ करके गांधी को मरवा दिया जिससे स्वयंसेवकों को बदनाम किया जा सके उनका बलिदान धूमिल हो जायें।

मूवीज़ की यही सीरिज़ फिर इतिहास बनकर आने वाली नस्लों के दिमाग़ मे बैठ जाएगी, इन्ही से इमेज बिल्डिंग हो जायेगी, आप सोच सकते हैं अब अलाउददीन ख़िलजी का नाम आते ही सबके ज़ेहन मे पदमावती का अय्याश, धोखेबाज़ और सनकी किरदार उभरेगा, शुक्र कीजिये भंसाली का कि उसने अलाउददीन ख़िलजी को इंसानी ख़ून पीते नही दिखाया या उसके हरम मे छोटी छोटी बच्चियां नही दिखायीं, वो आप इस सीरिज़ की किसी और मूवी मे देख सकते हैं।

अब इन्हे आधार बना कर ही बहस की जाएगी, इन्ही के आधार पर ताने दिए जायेंगें मौजूदा दोर के लिए अलग से कोई मूवी बनाने की ज़रूरत नही, मुसलमानों को टेरेरिस्ट साबित करतीं बहुत सी मूवी पहले ही बन चुकी हैं। कर्णी सेना से विरोध कराकर मूवी रिलीज़ कराने के पीछे मक़सद यह था कि आने वाले वक़्त मे अगर मुसलमान किसी मूवी का विरोध करें तो उन्हे जवाब देने के लिए पहले से एक मिसाल मौजूद रहे।

(लेखक स्वतंत्र टिपप्णीकार हैं)