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नज़रियाः अब समय है कि मुसलमानों से देशभक्ती का सबूत मांगने वाले पहले अपनी देशभक्ती सिद्ध करें

नदीम अख़्तर

‘वफ़ादारी’ एक ऐसा लफ़्ज़ जिस पर बहुत कुछ कहा, सुना गया, शायरी भी की गयी, वफ़ादारी का विलोम (antonym, मुतज़ाद) है ग़ददारी, जिस तरह हर इंसान ख़ुद को और अपनी क़ौम को वफ़ादार साबित करने के लिए लम्बे चौड़े दावे करता रहता है इसी तरह हर शख़्स दूसरे इंसान और उसकी क़ौम को ग़ददार साबित करने मे भी देर नही लगाता, वफ़ादारी का इम्तिहान लेने के लिए जो सबसे बड़ी शर्त है वो है ‘अपनाना’।

यानी जब तक आप किसी को अपनायेंगे नही आप उसकी वफ़ादारी का इम्तिहान नही ले सकते, यानि हम अपने नौकर, दोस्त, बीवी, पार्टनर की वफ़ादारी का इम्तिहान ले सकते हैं क्योंकि हम उन्हे अपना चुके हैं, अब कोई भी ऐसा शख़्स जिससे हमारा कोई ताल्लुक़ ही नही, कोई रिश्ता ही नही उसकी क्या वफ़ादारी और क्या ग़ददारी ?

अब इस कंसेप्ट पर मुसलमानों के बारे मे बात करते हैं, देश की साम्प्रदायिक ताक़तें हमेशा मुसलमानों की वफ़ादारी पर सवाल उठाती रही हैं, उन मुसलमानों की वफ़ादारी पर जिन्हे इन साम्प्रदायिक ताक़तों ने कभी अपनाया ही नही, मुसलमानों की दाढ़ी से नफ़रत, टोपी से नफ़रत, कुर्ते से नफ़रत, बुर्क़े से नफ़रत और सवाल वफ़ादारी पर, अपने मुहल्लों मे रहने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर।

चुनाव मे टिकट नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, स्कूल / कॉलेज मे पढ़ने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, नौकरी देंगे नही और सवाल वफ़ादारी पर, दोस्त बनायेंगे नही, बस मे बराबर की सीट पर बिठायेंगे नही, जायदाद न ख़रीदेंगे, न बेचेंगे, और सवाल वफ़ादारी पर , तो भाई जब आपने हमे अपनाया ही नही तो वफ़ादारी का इम्तिहान कैसे लिया ?

एक बात और समझो, वफ़ादारी एक तो होती है मुल्क से जिसके लिए मुसलमान वफ़ादार थे, हैं, रहेंगे , किसी पार्टी या किसी नेता का वफ़ादार होने के लिए हम मजबूर नही, साम्प्रदायिक पार्टियों और नेताओं के लिए तो बिलकुल नही, रही बात समाज की तो अपनाकर देखना होगा और जिन्होंने अपनाया है वे देख भी रहे हैं, हमेशा वफ़ादार निकलें हैं, हां अफ़राज़ुल के घरवाले शम्भूलाल से वफ़ादारी तो कोई मुसलमान तो छोडिये जिसके अंदर इंसानियत होगी वह बिल्कुल भी उससे वफादारी नहीं करेगा, जैसा कि दक्षिणपंथी ताकतें चाहती हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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