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नज़रियाः मुसलमानों को लेकर मीडिया का बुना जाल और उस जाल फंसकर ‘अलग’ दिखने की सनक

नदीम अख़्तर

मेरे जिन क़ाबिल दोस्तों ने साइंस ( फ़िजिक्स, कैमिस्ट्री, लाइफ़ साइंस ) मे मास्टर डिग्री ( पी जी) ली है उन्हे कुछ कन्सेप्ट, थ्योरी, प्रिंसिपल समझ नही आये होंगे इसी तरह साहित्य ( उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी) मे मास्टर करने वालों को कुछ पोयम्स, अश्आर, पद्य समझ नही आये होंगे, लेकिन क्या वो इतनी हिम्मत कर पायेंगे कि जो उन्हे समझ नही आया उसे वो ग़लत कह सकें ? नही , वो कहेंगे कि उन्हे समझ नही आया, लेकिन मज़हब की कोई बात अगर किसी ‘ठप’ ‘अहमक़’ जाहिल के भी समझ न आये तो वो फ़ोरन उस बात को ग़लत कह देगा, यह नही कहेगा कि उसकी समझ नही आ रही,

एक और बात पर आप ग़ौर करें, क्या कोई बहुत क़ाबिल ज़हीन डॉक्टर भी इंजीनियरिंग की किताबें पढ़ कर ख़ुद को इंजीनियर कह सकता है ? इंजीनियरिंग कर सकता है ? किसी बुध्दू इंजीनियर को भी चैलेंज कर सकता है ? नही न, या इसके उलट देखें क्या कोई बहुत क़ाबिल इंजीनियर, डॉक्टरी की किताबें पढ़ कर ख़ुद को डॉक्टर कह सकता है ? डॉक्टर की तरह प्रैक्टिस कर सकता है ? किसी कमक़ाबिल डॉक्टर को चैलेंज कर सकता है ? नही न, लेकिन जैसे ही कोई दसवीं फ़ेल ( या कोई भी हो ) दीन की दो किताबें पढ़ता है ख़ुद को आलिम फ़ाजिल, मुफ़्ती समझने लगता है , फिर वो तमाम आलिम ए दीन को अपनी नज़र मे हक़ीर ( इनफ़िरियर) समझने लगता है , उन्हे परेशान करता है, मुल्ला मुल्ला कहकर उनकी तौहीन शुरू कर देता है,

मै मानता हूं कि कुछ बातों को लेकर इख़तिलाफ़ है लेकिन ऐसा नही कि उलेमा मज़हब की असल रूह से ही दूर हो गये हों, यह भी सही है कि मज़हब के नाम पर पाखन्ड और आडम्बर है लेकिन इसका मतलब यह नही कि मज़हब के नाम पर सिर्फ़ पाखन्ड और आडम्बर ही बचा है। सवाल उठता है कि यह तथाकथित पढ़ा लिखा आधुनिक वर्ग मज़हब से बेज़ार और उस पर तनक़ीद (आलोचना) करता क्यों नज़र आता है ?

पहली वजह यह है कि मज़हब जिस पाकीज़ा अनुशासित और संजीदा ज़िंदगी का पैग़ाम देता है वो उन्हे बोझ लगता है, यह तथाकथित आधुनिक वर्ग ज़िंदगी का मज़ा लेना चाहता है, हर तरह की अय्याशी और हर तरह से तरक़्क़ी करने को सही मानता है, मज़हब इसमे रूकावट दिखता है तो वो मज़हब छोड़ना तो नही चाहता लेकिन उसमे तबदीली चाहता है ताकि मज़हब मे रह कर भी वो तमाम तरह के मज़े ले सके

दूसरी वजह मीडिया ने जो मज़हब को अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और आतंकवाद से जोड़ा है तो वो उस इमेज से भी छुटकारा चाहता है, वो अपने कलीग्ज़, बोस, दोस्तों के सामने यह ज़ाहिर करना चाहता है कि मै ऐसा मुसलमान नही हूँ जैसा मुसलमान तुम सुन या समझ रहे हो, मै कुछ अलग तरह का मुसलमान हूँ, कुछ अलग, पढ़ा लिखा, आधुनिक, वो तो और मुसलमान हैं जिन्हे तुम मुसलमान समझ रहे हो।

अपने उन दोस्तों के सामने उन पुरानी तरह के मुसलमानों को बुरा भला भी कहेगा, हालाँकि होना यह चाहिए था कि वो मुसलमानों की मीडिया के ज़रिये बनायी इमेज को झूठा साबित करता ऐसा वो अपनी नालायक़ी की वजह से नही कर सका इसलिए उसने उन मुसलमानों की एक अलग क्लास बना दी, पुराने, दक़ियानूस मुसलमान।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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