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नज़रियाः क्या आपके सर पर मौलवी साहब तलवार लिये खड़े हैं कि उनकी बात न मानी तो सिर उतार लेंगे ?

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नदीम अख़्तर

किसी डॉक्टर से पूछिये, ‘ स्मोकिंग सेहत के लिए कैसा है ? ‘ ज़ाहिर है नुक़सानदेय बतायेगा, स्मोकिंग करने वालों के पास बैठने को भी मना करेगा, हालाँकि बहुत से लोग स्मोकिंग करते हैं यहाँ तक कि कुछ डॉक्टर्स भी स्मोकिंग करते हैं, लेकिन बहुत से लोगों के या ख़ुद डॉक्टर के स्मोकिंग करने को दलील बनाकर न कभी स्मोकिंग को सही ठहराने की ज़िद की गयी न किसी न डॉक्टर की आलोचना की गयी,

किसी टीचर से पूछिये ‘ इम्तिहान मे नक़ल करना कैसा है ? ‘ ग़लत बतायेगा , नक़ल करने वालों के पास बैठने वाले दूसरे बच्चों को भी शक की नज़र से देखा जाता है, हालाँकि बहुत से बच्चे नक़ल करते हैं यहाँ तक कि कुछ टीचर्स ख़ुद नक़ल कराते हैं लेकिन बहुत से स्टूडेंटस के नक़ल करने यी टीचर्स के नक़ल कराने को दलील बनाकर कभी नक़ल को सही ठहराने की कोशिश नही की गयी न टीचर्स पर एतराज़ हुआ कि उन्होने नक़ल को ग़लत क्यों बताया ?

किसी वकील से पूछिये, ‘ बिना हेलमेट राइडिंग या बिना सीट बेल्ट ड्राइविंग कैसी है ? , ग़लत है, हालाँकि बहुत से लोग करते हैं यहाँ तक कि कुछ वकील भी करते हैं लेकिन कभी बहुत से लोगों या कुछ वकीलों की बिना हेलमेट ऱाइडिंग या बिना सीट बेल्ट की ड्राइविंग को दलील बना कर न तो इसे सही ठहराया गया न किसी ने वकील की आलोचना की,

यानी हर एक्सपर्ट अपने फ़ील्ड के क़ायदे क़ानून के मुताबिक़ बात करता है दूसरी बात मैने ऐसे इंसान भी नही देखे कि वो अपनी सेहत के बारे मे किसी नेता से राय ली हो या बच्चों की एजुकेशन के बारे मे किसी खिलाड़ी से राय ली हो यानी एक्सपर्ट से ही राय लेंगे अब बात करते हैं मज़हब की, ख़ास तौर पर मज़हब ए इस्लाम की, मज़हब के बारे मे राय लेंगे शाज़िया इल्मी से या किसी और नेता या तथाकथित सोशल एक्टिविस्ट को पकड़ लेंगे यहाँ तक कि मुसलमान होना भी ज़रूरी नही समझते किसी ग़ैर मुस्लिम से ही मज़हब ए इस्लाम के बारे मे राय लेने लगेंगे।

अब अगर मौलवी से पूछेंगे भी तो यह नही चाहते कि वो मज़हब के मुताबिक़ राय दे यानी यह नही चाहते कि जिस फ़ील्ड का वो एक्सपर्ट है उस फ़ील्ड के क़ायदे क़ानून के मुताबिक़ राय दे बल्कि चाहते हैं कि मौलवी यह देखकर राय दे कि हो क्या रहा है ? ज़्यादा लोग क्या कर रहे हैं ? वक़्त का निज़ाम क्या चल रहा है ? अगर वो ऐसा नही करेगा तो मौलवी की आलोचना शुरू, उसकी ज़ात पर हमले, ये ऐसे, ये वैसे, ये यूं,ये वूं, और न जाने क्या क्या, अरे बही मौलवी वो कहेगा जो उसने पढ़ा है, अगर उसने पढ़ा है कि सूद का लेना ,देना , सूद के लेनदेन की लिखापढ़ी करना मना है तो वो वही बतायेगा, अब दुनिया क्या कर रही हैं ? न तो यह दलील है, और मौलवी ख़ुद क्या कर रहा है ? न यह दलील है, न मौलवी तलवार लिये तुम्हारे सिर पर खड़ा है कि उसकी बात न मानी तो सिर उतार देगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)