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नज़रियाः एक ही विचारधारा है जो रोहित वेमुला से लेकर धन्याश्री तक को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रही है।

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नदीम अख्तर

एक ही विचारधारा है जो लोगों को आत्महत्या कर लेने के लिए मजबूर कर रही है , चाहे वो दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या हो, व्यापारी प्रकाश पांडेय की आत्महत्या हो या ‘आई लव मुस्लिम’ बोलने वाली चिकमंगलूर की लड़की की आत्महत्या हो, यही विचारधारा छात्र नजीब की गुमशुदगी के पीछे है।

यही विचारधारा अफ़राज़ुल, अख़लाक़, जुनैद को बेरहमी से क़त्ल कर रही है, यह विचारधारा जिन्हे क़त्ल नही कर पाती या ख़ुदकुशी के लिए मजबूर नही कर पाती उन्हे बदनाम करती है, अश्लील सी डी बनाकर या दुश्मन देश से मिले होने का इलज़ाम लगा कर, यह विचारधारा बहुत तेज़ी से पैर पसार रही है।

किसी भी महामारी के फैलने की रफ़्तार से भी ज़्यादा तेज़ , इसका सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि इस महामारी ( विचारधारा) से पीड़ित ख़ुद को गौरवान्वित भी महसूस कर रहा है, उसे नही पता कि वो ख़ुद भी बर्बाद हो चुका है और मुल्क को नुक़सान करने की वजह बन चुका है, इस विचारधारा को आदर्श मानने वाले आत्ममुग्ध समाज को नही पता कि वो किन क़ातिलों को अपना हीरो मान रहा है।

वर्तमान के ये क़ातिल भविष्य मे नरपिशाच बनकर जब इसी समाज पर टूट पड़ेंगे तो छिपने बचने की जगह न बचेगी , कौन गारंटी दे सकता है कि पागल कुत्ता अपने मालिक को नही काटेगा ? , आदमख़ोर भेड़िये मज़हब नही पहचानते, उन्हे ख़ून चाहिये होता है, इंसानी गर्म ख़ून, वो किसी का भी हो सकता है, संभल जाओ, होश मे आओ, नफ़रत मे इतने अंधे न बनो।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)