Home देश मुग़ल-ए-आज़म: के. आसिफ़ से फ़िरोज़ अब्बास ख़ान तक

मुग़ल-ए-आज़म: के. आसिफ़ से फ़िरोज़ अब्बास ख़ान तक

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रवीश कुमार

जो देख रहा था, वो अतीत का एक किस्सा था, जो दिख रहा था, वो वर्तमान का किस्सा था। जगह का नाम था जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम। नाटक का नाम था मुग़ल-ए-आज़म। किताबों के कवर और सरकारी इमारतों की तख़्तियों से बेदखल किए जा रहे इन दो नामों को आपस में टकराते देख रहा था। फ़िल्म के पर्दे से कोई चीज़ जब रंगमंच पर उतारी जाती है, तो वह पुराने को नया बना देती है। के आसिफ़ की फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म की शान में कुछ भी कहना गुस्ताख़ी होगी, फ़िरोज़ अब्बास ख़ान के नाटक मुग़ल-ए-आज़म की शान में कुछ न कहना गुस्ताख़ी हो जाएगी।

एक मुकम्मल फ़िल्म में ऐसा क्या अधूरापन देखा होगा, जिसे पूरा करने का जुनून फ़िरोज़ ख़ान पर हावी हुआ होगा। मुझे नहीं मालूम था कि बार बार देखी गई एक फ़िल्म में इतना कुछ देखना बाक़ी रह गया था। बल्कि फ़िरोज़ के निर्देशन में इस महानाटक ने पहले ही सीन से समझा दिया कि आपने जो देखा है, दरअसल उस देखे हुए को समझने के लिए फिर से देखना होगा। एक झटके में यह नाटक फ़िल्म के साये से अलग होकर आज के समय के साये के साथ हो लेता है। लव जिहाद के मामलों को अब एन आई ए जांच रही है, मुग़ल-ए- आज़म का यह लव जेहाद भारत की संस्कृति और संगीत के ज़रिए इतिहास की इस प्रेम कहानी को फिर से गढ़ रहा था। शायद चुनौती दे रहा था। दावा कर रहा था कि गाथाओं की एक ख़ूबी होती है। उनकी हुकूमत कोई बादशाह नहीं बदल सकता है। बल्कि उनमें ताक़त होती है कि बादशाह की हुकूमत बदल दे।

अक़बर यहां महान होने के दावे से मुक्त है। वो इतिहास का एक ऐसा किरदार है, जिससे इतिहास ही अब दूर जा चुका है। देखने वालों पर इतिहास का बोझ है। अक़बर पर इतिहास का बोझ नहीं है। शायद इसी वजह से फ़िरोज़ अब्बास ख़ान की जोधाबाई सलीम से राजनीति और मोहब्बत के फ़र्क को समझने के लिए कहती है। राजनीति का इस तरह से इस्तमाल किया जाना, लग रहा था जैसे वो जोधा के अकबर आज की राजनीति में फंसे हैं। उनमें साहस नहीं कि वे अपने लख़्त-ए-जिगर को उसकी अनारकली बख़्श दें। बादशाह के दरवाज़े पर नेशनल इंवेस्टिगेंटिग एजेंसी के अधिकारी खड़े हैं। सलीम किसी पार्क से भाग कर आया वो नौजवान लग रहा है जो राजनीति के अकबर से नहीं जीत पाता है। उसकी मां अपने बेटे को राजनीति से मोहब्बत निकाल कर नहीं दे पाती है। राजनीति में मोहब्बत है भी नहीं।

मैंने नाटक कम देखे हैं। इसलिए नाटक पर लिखने की न तो योग्यता है न ही उसके लिए ज़रूरी शब्द। पर जो देख रहा था वो अदभुत था। मैं क्या देख रहा हूं, क्या वही देख रहा हूं जिसे देखते हुए आप सोचते हैं कि आप किस्मत वाले हैं जो देख रहे हैं। मैंने सोचा भी नहीं था कि मुग़ल-ए-आज़म को लेकर दो अलग अलग अनुभव होंगे। एक बार भी मधुबाला याद नहीं आई। एक बार भी दिलीप कुमार याद नहीं आए। एक बार भी पृथ्वीराज कपूर याद नहीं आए। नहीं, वो कभी कभी याद आए। एक बार भी दुर्गा खोटे याद नहीं आईं। किसी देखी हुई चीज़ का अनुभव पहली बार देखने के अनुभव में बदल जाए, मैं इसी से हैरान था। शायद गदगद था।

सीन लगातार बदल रहे थे। रौशनी सीन को बदल रही थी। रौशनी का हर रंग अपने आप में एक सीन था। इतिहास का एक अलग पन्ना। के आसिफ़ की आत्मा मंच पर नहीं, दर्शक दीर्घा में आराम फ़रमा रही होगी। यह देखकर उनके मुग़ल-ए-आज़म को किसी ने कम नहीं किया है बल्कि एक और मुग़ल-ए-आज़म का निर्माण किया है जो उनसे कम बेहतर नहीं है। अनारकली और बहार का लाइव गाना यक़ीनन यक़ीन के काबिल नहीं था। तभी तो नाटक ख़त्म होने के बाद उनसे कहा गया कि आप गाकर दिखा दें। अभिनय करते वक्त इतना परफेक्शन से गाने का शऊर किसकी बख़्शीश रही होगी, मैं नहीं जानता। लगा कि नय्यरा नूर की आवाज़ है। संगीत और साउंड के बारे में क्या कहें। इतनी तारीफ़ न कर दूं कि आप जब देख कर लौटे तो नुक़्स निकालने का लुत्फ़ चला जाए। वैसे लाइव संवाद में सिर्फ एक चूक थी। एक जगह पर कोई संवाद से लड़खड़ाई थी। कितने महीनों का रियाज़ रहा होगा, बग़ैर किसी ग़लती के, बग़ैर किसी रि टेक के मंच पर उतर आया होगा। सोच कर ही अच्छा लग रहा है।

फ़िरोज़ अब्बास ख़ान के निर्देशन में उन सभी को बधाई जिन्होंने इस नाटक को जीया है। मुग़ल-ए-आज़म आउट आफ सिलेबस नहीं था, मगर रंगमंच पर लाकर फ़िरोज़ साहब ने इसे एक ऐसे सिलेबस का हिस्सा बना दिया है जिसकी नक़ल में न जाने कितने नाटक बनेंगे मगर के आसिफ़ की तरह कोई दोबारा फ़िरोज़ का मुग़ल-ए-आज़म नहीं बना सकेगा। इस नाटक में अकबर का इंसाफ़ ही नहीं था बल्कि फ़िरोज़ साहब का भी इंसाफ़ था। जिस जवाबदारी से उन्होंने फ़िल्म को मंच पर उतारा है, उसके लिए उन तक मेरा सलाम पहुंचे। खड़े होकर ताली बजाई है मैंने।

टीवी के फ्रेम से बाहर आकर एक एक पल में ज़िंदगी नज़र आ रही थी। यक़ीन पैदा हो रहा था, ऐसा ही जुनून फिर से हो कि कोई काम मुकम्मल तरीके से की जाए। मंच में सलीम अपने रग़ो में दौड़ते ख़ून की बात कर रहा था, सामने बैठा मैं अपनी रग़ों में ख़ून महससू कर रहा था। हमें ज़िंदगी के लिए ज़िंदगी के किस्सों में जाना होगा। वही मनुष्य बने रहने की संभावनाएं हैं। जहां कुछ लोग मिलकर चुपचाप रच रहे होते हैं, जिन्हें देखकर आप शोर से भर उठते हैं। तुम कब रचोगे, तुम्हारे पास भीतो माध्यम है। उसमें संगीत है। संवाद है। दृश्य है। फिर वो ज़िंदगी से महरूम क्यों हैं।

दोस्तों, मेरे लिखे पर न जाइयेगा, देख आइयेगा। 9 से 17 सितंबर तक इसके शो हैं। दरअसल, मैंने कुछ भी नहीं बताया कि क्या देखा है। जो देखा है, वो बता ही नहीं पा रहा हूं। ज़रूर मुझ पर जादू हुआ है, जो अब तक नहीं उतरा है।

(मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से)