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नज़रियाः मुसलमानों के लिये क्यों जरूरी है तथाकथित सेक्यूलर दलों से दूरी ?

मुईनुद्दीन इब्ने नसरुल्लाह

अकेले असदुद्दीन औवेसी को लोकसभा में मुसलमानो के हक़ में लड़ते देख कर मुसलमान अपना सियासी मुस्तक़बिल कांग्रेस के भरोसे अब नही रखना चाह रहा था।अच्छे अच्छे लोग जो ओवैसी को वोट कटवा कह रहे थे वो भी अब समझ चुके थे के ये नही चलेगा, अब और कांग्रेस की ग़ुलामी नही की जाएगी।

मुसलमान देख चुके थे के दाढ़ी टोपी वाले बुज़ुर्ग भी राहुल गांधी के ग़ुलाम बन कर जाते हैं, वो क़ौम की कम कांग्रेस की ज़्यादा सुनते हैं। इसलिए ये कांग्रेस की कब्र खुदने जैसा मामला हो चुका था। मुसलमान तीन तलाक बिल के बदले कांग्रेस को तलाक देने के फुल मुड़ में आ चुका था।

जाके किसी ने हाईकमांड को कहा होगा ये बेवक़ूफ़ी न करो,मुसलमानो में शदीद गुस्सा है, जो बेवक़ूफ़ी लोकसभा में की उसको राज्यसभा में न दोहराया जाए वरना 2019 में 25 असद औवेसी मुसलमान पार्लियामेंट में भेजेंगे। और फिर कांग्रेस और मुसलमान का हमेंशा का तलाक हो जायेगा।

यूँ भी देश मे हर जगह से कांग्रेस की अर्थी उठ रही है , उसमे अगर मुसलमानो ने क़ब्र खोदने का काम किया तो फिर भविष्य कांग्रेस का खत्म हो सकता है, इसलिए बेहतरी इसमें ही है कि लोकसभा वाली ग़लती राज्यसभा में सुधार ली जाए। वरना नतीजे बहुत खराब भुगतने पड़गें।

कांग्रेस ने राज्यसभा में बिल इसलिए नही रुकवाया क्योंकि वो नाइंसाफी पर मबनी था, बल्कि लोकसभा में खुद का मुसलमान मुखालिफ चेहरा बेनक़ाब होने के बाद मुसलमानो में कांग्रेस मुखालिफ हवा और मुसलमानो के शदीद गुस्से ने इन्हें तीन तलाक बिल रोकने पर मजबूर कर दिया। कांग्रेस की मुसलमानों से हमदर्दी होती तो बिल के खिलाफ लोकसभा में इनका रवय्या कुछ अलग ही होता.

लेकिन अब डैमेज हो चुका है। मुसलमानो के पढ़े लिखे तबके में भी ये बात हो रही है के ये तथाकथित सेक्यूलर लोग जिन्हें उन्होंने वोट दे कर पार्लियामेंट में भेजा है, वे वहां जा कर बदल जाते हैं। इस एपिसोड ने मुसलमानो को बहुत कुछ सिखा दिया है जिसका नतीजा जल्द ही देखने को मिलेंगे।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं)

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