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यादों में अनवर : ‘वो कहते हैं ये जिंदगी कुछ नहीं, कि उनके लिये मौत भी कुछ नहीं’

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मोहम्मद नज्मुल क़मर

अनवर जलालपुरी का नाम ज़बान पर आते ही नौजवानों से लेकर बुज़ुर्गों के ज़हन में एक शख्सियत उभर कर आती है, हर दिल अज़ीज़ नाज़िम ए मुशायरा की और एक मारूफ शायर की। और आवाज़ गूंजती है वाह वाह, बहुत ख़ूब। अनवर जलालपुरी की पैदाइश 6 जुलाई को मशहूर अदबी क़स्बा जलालपुर में हुई, इब्तिदाई तालीम मदरसा इस्लामिया में हासिल की, 1962-64 में नरेंद्र देव कालेज से इंटर करने के बाद पूर्वांचल के मशहूर तालीमी इदारे शिब्ली कालेज आ गए, शेर ओ शायरी और खिताबत से दिल चस्पी इस क़दर थी कि सभी तरह के कल्चरल प्रोग्रामों में हिस्सा लेने में आगे आगे ही रहे।

अल्फ़ाज़ों का मौके पर इस्तेमाल करना उन्हीं दिनों आ गया था, अपनी तक़रीरों से लोगों के दिलों में जगह बनाते चले गए ,तलबा यूनियन के इलेक्शन में सेक्रेट्री के ओहदे पर जीत हासिल की, आगे की तालीम के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का रुख किया और यहीं पोस्ट ग्रेजुएशन और पीएचडी मुकम्मल की। नरेंद्र देव इंटर कॉलेज में लेक्चरर की हैसियत से अपनी ख़िदमात अंजाम देने लगे।

मुशायरों की दुनिया में क़दम रखा तो निज़ामत के काम को अंजाम देने लगे, किसी भी मुशायरे में उनकी मौजूदगी मुशायरों की कामयाबी की जमानत होने लगी, आहिस्ता आहिस्ता निज़ामत की दुनिया में चमकते सूरज की तरह हो गए, हर ख़ास व आम की पहली पसंद होने लगे, अपनी हाज़िर जवाबी और अल्फ़ाज़ों के बेहतर इस्तेमाल से लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आते थे, जुमलों का कुछ यूँ इस्तेमाल करते थे कि हर कोई मुंह तकता रहता और वाह वाह कहने लगता ।

हवा हो तेज़ तो शाखों से पत्ते टूट जाते हैं

ज़रा सी देर में बरसों के रिश्ते टूट जाते हैं

अनवर जलालपुरी एक मारूफ़ शायर भी थे, हम्द, नात, नज़्म, क़सीदा, मर्सिया और क़तआत में उनको महारत हासिल थी, ग़ज़ल की तरफ रुख किया तो एक बढ़कर एक रंग ए तग़ज़्ज़ुल के अशआर कहे जो उनकी शायरी की सनद हो गए, शायरी की उनकी किताबें “खारे पानियों का सिलसिला”, “खुशियों की रिश्तेदारी” और हम्द व नात की “ज़र्ब ए ला इलाह” “हर्फ़ ए अब्जद” “जमाल ए मुहम्मद ” बहुत मक़बूल हुईं,

नूर ए अहमद जो बने टुकड़ा उसकी ज़ात का

जो बिला शक है सबब तख़लीक़ मौजूद ज़ात का

शायरी के अलावा अनवर जलालपूरी की नस्र निगारी भी लोगों के दिलों पर बहुत असर अंदाज़ होती थी, उन्होंने अल्लामा इक़बाल, मौलाना आज़ाद, ख़ुमार बाराबंकवी, राहत इंदौरी के बारे में जो मज़ामीन लिखे वह उर्दू अदब में बड़ी अहमियत के हामिल हैं, उनकी क़लम में बहुत शीरीं बयानी है, एक जबरदस्त रवानी उनके मज़ामीन में मिलती है, उनकी नस्र की किताबें “रौशनाई के सफ़ीर” है .

अनवर जलालपुरी ने फ़िल्मी नग्मे भी लिखे, हुस्न व इश्क़ के बयान से कोई शायर अलग नहीं रह सकता, अनवर जलालपुरी अवाम की शायरी करते थे, अवाम के मसायल उनके अशआर में बयान होते थे, नसीरुद्दीन शाह, विद्या बालन और अरशद वारसी की अदाकारी वाली “डेढ़ इश्किया” फ़िल्म में दिखाए गए मुशायरे में भी नाज़िम का किरदार अदा किया,उनके लिखे फ़िल्मी नग्मों की एक झलक..

हीरो:

जिस लड़की से प्यार है मुझको

वह लड़की अलबेली है

सर से पांव तलक वह गोरी

चम्पा और चमेली है

 

हिरोइन:

जिस लड़के को दिल दे बैठी

वह लड़का अलबेला है

तितली, कलियों और फूलों के

साथ वह बरसों खेला है

अनवर जलालपुरी ने जब भगवद गीता का उर्दू शायरी में तर्जुमा किया,”शायरी में गीता” लिखा तो हर तरफ से उनके इस काम के लिए वाह वाही होने लगी, उत्तर प्रदेश सरकार ने सबसे बड़े अदबी एवार्ड “यश भारती”से सम्मानित किया,उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के चेयरमैन रहते हुए क़ाबिल ए सताइश काम अंजाम दिए। गीता का एक शेर देखिये –

सुनें अनवर जलालपुरी की भगवद गीता

धनंजय तू रिश्तों से मुंह मोड़ ले, है जो भी ताल्लुक उसे तोड़ ले

फ़रायज़ और आमाल में रब्त रख, सदा सब्र कर और सदा ज़ब्त रख।

क़त्ल दो, इक रहज़नी, इसके अलावा शहर में

ख़ैरियत ही ख़ैरियत है हादसा कोई नहीं।

गंगा जमुनी तहज़ीब का यह नुमाइंदा शायर, एक ज़ात में कई शख्सियतों का मालिक यह इंसान 2 जनवरी 2018 को इस दुनिया से कूच कर गया, और अदब की दुनिया को सूना कर गया। जब जब उर्दू की बदहाली की बात आती है तब तब अनवर जलालपुरी का शेर पढ़ा जाता है –

जिसे पढ़ता नही कोई बोलते सब हैं

जनाब ए मीर भी कैसी जबान छोड़ गये।

जब जब मुशायरों की जिक्र आता है वह जिक्र अनवर जलालपुरी की आवाज के बगैर मुकम्मल नहीं होता, एक एसा शख्स जो इंग्लिश पढ़ाता है, उर्दू में शायरी करता है, संस्कृत का उर्दू में अनुवाद कर देता है। यह खूबियां तो अनवर जलापुरी में ही थीं। किसी शायर ने कहा है कि –

लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं

उनमें बस एक खराबी है कि मर जाते हैं।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर हैं)