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नफरत, हिंसा, आगज़नीः यह हादसे नहीं साज़िश हैं, यह हत्या की एक सीरीज़ है

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मोहम्मद नज्मुल क़मर

कलबुर्गी,पंसारे और अख़लाक़ की हत्या से शुरू हुई अत्याचार व ज़ुल्म की एक लंबी सीरीज़ है, ऊना, सहारनपुर, जुनेद,अफ़ज़ारूल, आंध्रा प्रदेश में मुअज़्ज़िन की हत्या और अब भीमाकोरेगांव तक पहुंची यह सीरीज़ कहीं अपने आप नहीं हो गई, इसकी एक लंबी तैयारी हुई होगी, लोगों के ज़हनों में ज़हर घोलने का जो काम बरसों से हो रहा था यह उसी ज़हर का रिजल्ट है।

पहले दंगों की सीरीज़ चलती थी मगर पिछले कुछ सालों से दंगों की सीरीज़ बंद कर दी गई है ,शायद दंगों के न होने का गुणगान भी सुनने को मिलेगा, हो सकता है आने वाले चुनावों में दंगों के न होने का ज़िक्र चुनावी मंचों से हो। सोचने और विचार करने की बात यह है कि आखिर ऐसी क़त्ल और ज़ुल्म करने वाली भीड़ और उस भीड़ के दिमाग में यह ज़हरीली सोच भर कौन रहा है?, क्यों जाति और धर्म के आधार पर नफ़रत पनप रही है।

इस सोच को पैदा करने में कई दशक लगे हैं, कई हज़ार लोगों ने दिन रात इस के लिए काम किया है, इस सोच के पनपने के समय जो लोग शांत थे आज वह भी इसका शिकार हो रहे हैं और आज वह भी सत्ता और कुर्सी से दूर हो गए हैं क्योंकि अपनी कुर्सी बचाने के लिए वह पहले चुप रहे।

आज दलितों, शोषितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को तमाम मतभेद भुलाकर एक मंच पर और एक आंदोलन में साथ आने की ज़रूरत है, अपनी मठाधीसी भी छोड़नी पड़ेगी, तथाकथित ठेकेदारों को भी दरकिनार करना होगा, बात जन आंदोलन और जनजागरूकता से ही बनेगी, सियासत के उन डकैतों से होशियार रहने की आवश्यकता है जो संसद और विधान सभा पहुँचने के लिए बिकाऊ रहते हैं,सच्चे लोगों को पहचानना होगा।

न ज़मीं से निकलेगा न आसमां से निकलेगा

हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर हैं ये उनके निजी विचार हैं)