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कोरेगांव हिंसाः मीडिया ने बता दिया कि दलित ना तो कल हिन्दू था और ना आज हिन्दू है।

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मोहम्मद नज्मुल क़मर

कोरेगांव मूलनिवासियों की रैली पर हमला हुआ, कई लोग ज़ख्मी हुए, पत्थर चले, आतंकवादी थे सभी हमलावर, लेकिन इसी बीच सबसे खतरनाक जो चीज़ देखने को मिली वह रही मीडिया की भेड़िया चाल, मीडिया लिखता है कि “अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मनाने पर हिंदुओं और दलितों में मार पीट”, अब आप जब मीडिया की रिपोर्ट पढ़ेंगे तो आपके ज़हन में यह बात घुसा दी जायेगी कि मूलनिवासी पेशवाओं की हार और अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मना रहे थे, दर अस्ल सारी ज़हरीली सूईं गोदी मीडिया ही लगाता है, और देश का आम नागरिक उस ज़हर को लेते लेते ज़हरीला हो जाता है।

मूलनिवासी जो रैली कर रहे थे वह थी उस याद में कि जब इन जातिवादियों से मुक्ति मिली थी मूलनिवासियों को, जब यह जातिवादी और इंसानों को ग़ुलाम बनाने वाला सवर्ण समुदाय हारा था, जब मठाधीश बने पंडो को मुंह की खानी पड़ी थी ।

अब बात ख़बरों की हैडिंग पर

मीडिया ने तो यह बता दिया कि दलित न कभी हिन्दू था और ना आज है, और न कभी होगा, दूसरी बात कि सिर्फ दलित ही नहीं मूल निवासी कोई भी हो वह पंडों की गुलामी में नहीं रहना चाहिए, गोदी मीडिया भले ही पंडों की ख़ुशी के लिए लिखता हो ऐसा मगर सच्चाई कहीं न कहीं कह ही जाता है कि दलित और मूलनिवासी हिन्दू नहीं ।

दो दिन पहले जनसत्ता जैसा अख़बार के न्यूज पोर्टल ने लिखा था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बीजेपी को चिढ़ाने के लिए लगायेगा 200 फीट ऊँचा तिरंगा, यह हैडिंग थी तो AMU को चिढ़ाने के लिए, मगर इस में भी एक सच कह गए कि आरएसएस और बीजेपी तिरंगे से चिढ़ते हैं, जो हमेशा से चिढ़ते रहे हैं।

राष्ट्रवाद, देशभक्ति, हमारी संस्कृति जैसे मीठे ज़हर आपको और हमको दिए जा रहे हैं और हम इस ज़हर को अमृत समझकर पीते जा रहे हैं, अंदर ही अंदर हम ज़हरीले होते जा रहे हैं।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर हैं ये उनके निजी विचार हैं )