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लोगों की जान लेने वाले हत्यारों को अपना हीरो मत बनाईये

नितिन ठाकुर

एक गैंगस्टर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता है। दुनिया वाकिफ है कि वो लंबे वक्त से जुर्म में मुब्तिला रहा। उसके ‘हीरोइज़्म’ पर उसकी जाति वाले फिदा थे। जब वो मारा गया तो जाति वालों को गुस्सा आ गया। रोड जाम, पथराव, पुलिस पर हमला… सब कुछ बिल्कुल वैसे ही करने लगे जैसे कश्मीर में लोग करते हैं। कमाल तो ये है कि आरोप भी वैसा ही… फर्ज़ी एनकाउंटर का!!

लेकिन ये लोग गद्दार नहीं हैं। ना इनके लंबी दाढ़ी है, ना गोल टोपी और ना ये चिढ़ाने के लिए पाकिस्तान का झंडा लेकर आए हैं। सबको मालूम है कि अंतिम संस्कार के वक्त हुुजूम उमड़ेगा। क्या तब भी ये बयान आएगा कि एक कुख्यात गैंगस्टर के जनाजे में शामिल लोग भी संभावित अपराधी हो सकते हैं इसलिए इन पर ड्रोन मार दो ? नहीं। दरअसल राष्ट्रवाद का तमगा अब धर्म देखकर बांटा जाने लगा है, करतूत देखकर नहीं। बहुत पहले स्कूपव्हूप पर पत्थरबाज़ों के बारे में एक साहसी डॉक्यूमेंट्री देखी थी। प्रदर्शन के दौरान ISIS का झंडा दिखाने पर जब कश्मीरी लड़कों से सवाल पूछा गया तो उनमें से एक ने जवाब दिया था- सर, यहां पर ISIS ना है और ना आनेवाला है। हम ये झंडा खुद से बनाकर इंडियन फोर्सेज को दिखाते हैं.. क्योंकि हमको उन्हें चिढ़ाना होता है बस।

हत्यारोपी के शव पर तिरंगा क्यों

जिन्हें वो फर्ज़ी सा काला झंडा देखकर गुस्सा आता है, क्यों उन्हें दादरी में एक हत्यारे के शव पर तिरंगा लिपटा देख गुस्सा नहीं चढ़ा ? बस इसलिए क्योंकि झंडे के पीछे जो लोग हैं उनका मज़हब बदल गया? अहसास कीजिए, ये सभी घटनाएं और इनके पीछे के आक्रोश कहीं ना कहीं आपस में गुथे हैं। हर किसी को लग रहा है कि वो व्यवस्था द्वारा उपेक्षा का शिकार है और इसीलिए उसका सामना बंदूक से करेंगे। हिंसा की बड़ी घटनाओं के ब्यौरे हमारे दिमाग को इस तरह से भरे दे रहे हैं कि उनके तल में होती वैचारिक हलचल को दरकिनार करना सुविधाजनक बन गया है। गुस्सा दाऊद को पसंद करनेवाले गैंगस्टर के घरवालों को भी है, गुस्सा बुरहान के घरवालों को भी है।

वजह अलग लेकिन हत्यारे तो हैं

वजह अलग हैं। दोनों गलत राह चल निकले। दोनों हत्यारे थे। इतने भर से फर्क नहीं पड़ता कि एक के मुंह पर कोई नारा था और दूसरे के मुंह पर फिरौती की रकम। दोनों ही व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर खून की होली खेल रहे थे। बुरहान भी कोई विजनरी नहीं था। भाई की मौत ने उसका सिर घुमा दिया और मोबाइल वीडियोज़ ने उसकी मार्केटिंग कर दी। गोली चलाने के लिए उसे एक मकसद पकड़ा दिया गया और बहुत सोचने समझने की जगह उसने वही किया जो एक बीसेक साल का लड़का करता। इन्हें हीरो मत बनाइए। ये लोग किसी समाज के हीरो नहीं हो सकते। इनके चक्कर में अपनी पुलिस और सेना पर पथराव मत कीजिए। आपका गुस्सा सरकारों पर हो सकता है। वो आपने ही चुनी हैं। उनसे पूछिए कि इन हिंसक तत्वों को ज़िंदा रखने या कथित फर्ज़ी एनकाउंटर्स में मार डालने के पीछे उनके कौन से हित पूर हुए?

(लेखक पत्रकारिता से जुड़े हैं)

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