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नज़रियाः क्या हैं जजों की प्रेस कांफ्रेंस के मायने ?

कवित कृष्णपल्लवी

यह सब कुछ होता रहेगा बीच-बीच में। कभी सत्ता के ढाँचे के भीतर से ही कोई नौकरशाह, तो कभी कोई जज, और कभी खुद सत्तारूढ़ फासिस्ट पार्टी के भीतर से विद्रोह करके कुछ व्यक्ति फासिस्टों की सत्ता के अत्याचार-अनाचार और कुछ नीतियों पर सवाल उठाते रहेंगे ।लेकिन इससे यह मान लेना अहमकपने की हद तक मासूमियत होगी कि इससे सबकुछ या कुछ भी ठीक हो जायेगा या ठीक होने की शुरुआत हो जायेगी।

बुर्जुआ व्यवस्था के भीतर के किसी भी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा कुछ मुद्दों पर सवाल उठाये जाने से बुर्जुआ व्यवस्था और उसके फासिस्ट संस्करण का न तो प्रभावी विरोध संभव है न ही विकल्प के निर्माण की दिशा में कोई अग्रगति। हां, इतना ज़रूर होता है कि सत्ता-तंत्र की कलई उतरने में किसी हद तक मदद मिलती है। फिर भी बुर्जुआ जनवाद के प्रति यह भ्रम बने रहने की ही अधिक गुंजाइश रहती है कि यदि ये बुराइयां दूर करके एक भ्रष्टाचार-मुक्त सत्ता चलाई जाये तो पूंजीवादी लोकतंत्र अभी भी कारगर ढंग से चलता रह सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश की सरकार-परस्ती के खिलाफ विद्रोह करना सिर्फ इतना ही बताता है कि व्यवस्था का संकट अत्यंत गहरा है और इसके कारण उसके अंदरूनी अंतरविरोध फूट-रिसकर बाहर आने लगे हैं। सत्ता के शीर्ष पर बैठा फासिस्ट गिरोह इस संकट का भी सुगमता से प्रबंधन कर लेगा और फिर सबकुछ यथावत चलने लगेगा।

कोई भी बुर्जुआ संसदीय पार्टी बुर्जुआ जनवाद को भी बचाने के लिए सडकों पर उतरने की कुव्वत नहीं रखती। संसदीय वामपंथियों की हालत भी इनसे कुछ बेहतर नहीं। जनवाद-रक्षा के लिए बने बौद्धिक मंचों की समय-समय पर होने वाली प्रतीकात्मक कार्रवाइयों से फासिस्टों को खुजली भी नहीं होती।

सारे विभ्रमों की जड़ सामाजिकार्थिक विश्लेषण का अभाव और इतिहास-अन्धता है। वर्त्तमान दौर का फासीवाद बुर्जुआ व्यवस्था के एक ऐसे असाध्य व्यवस्थागत संकट की उपज है, जहां से वापस बुर्जुआ जनवाद के “बेहतर दिनों” की ओर लौटना मुमकिन नहीं । इसीलिये बुर्जुआ वर्ग का कोई भी हिस्सा या उसकी कोई भी पार्टी इसके विरुद्ध प्रभावी ढंग से संघर्ष नहीं कर सकती। मेहनतकशों के विभिन्न जुझारू संगठनों- मंचो-आन्दोलनों का संयुक्त मोर्चा ही फासिज्म से सडकों पर मुकाबला कर सकता है।

इस मोर्चे के साथ मध्यवर्ग के रेडिकल हिस्से को भी जोड़ा जा सकता है किसी हद तक। यह भूलना नहीं होगा कि फासीवाद मध्यवर्ग का तृणमूल स्तर से संगठित एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है, और मेहनतकश वर्गों का एक जुझारू क्रांतिकारी सामाजिक आन्दोलन तृणमूल स्तर से खडा करके ही इसे शिकस्त दी जा सकती है।

न्यायपालिका पर सरकारी प्रभाव और उसमें भ्रष्टाचार पहले भी रहा है। फ़र्क सिर्फ़ यह पडा है कि व्यवस्था की बढ़ती पतनशीलता के साथ-साथ वह चरम तक जा पहुँची है और भरी हुई मैलागाड़ी से गन्दगी जब-तब सड़क पर छलकने लगी है। इस बात को भी भूलने की ज़रूरत नहीं है कि अपने शुद्धतम रूप में भी यह न्यायपालिका पूंजीपति वर्ग की ही सेवा करती है।

(यह लेख कविता कृष्णपल्लवी की फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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