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नज़रियाः व्यक्तिगत बयान देने से बचिये जिग्नेश आपको मालूम नहीं कि मीडिया अर्थ का अनर्थ निकालने के लिये तैयार खड़ा है।

अभिषेक श्रीवास्तव

जिग्नेश भाई, आप जीत गए, विधायक बन गए, इसकी बधाई लीजिए। बधाई के बाद एक बात कहने का मन है। देखिए, आप एक्टिविज्म की जिस धारा से आते हैं उसे इस देश की सक्रिय राजनीति में ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है। एक अरविंद केजरीवाल थे जिन्होंने सिविल सोसाइटी और एनजीओ से सदन तक का सफर तय किया। हम सब इस बात से वाकिफ़ हैं कि उनकी मंशा चाहे जो भी होती हो, बदनाम उन्हें कई गुना और कई बार किया गया अपनी जुबान के लिए। वे लगातार अपने बयानों के चलते विवाद में बने रहे जिससे लोगों का उनके प्रति परसेप्शन प्रभावित होता रहा, दूसरे उन्हें जो करना था वो भी अवरुद्ध होता रहा।

जब से अरविंद ने ये बात समझी, वे थोड़ा शांत हो गए। उन्होंने बेमतलब की बयानबाजी बंद कर दी। काम पर फोकस किया। चुपचाप एजेंडे पर लगे रहे। इससे पब्लिक परसेप्शन में भी बदलाव आया। आप समझ रहे होंगे मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। मोदीजी हिमालय जाएं, हड्डी गलाएं या जो चाहे करें, अपनी बला से। आप उन पर या किसी पर भी व्यक्तिगत बयान देकर अपनी ऊर्जा क्यों नष्ट करें? जबकि आप जानते हैं कि मीडिया मुंह बाए खड़ा है ऐसी बातों को लपक कर उसका अनर्थ निकालने के लिए!

भाई, क्या ही अच्छा होता कि आप चुनाव जीतने के बाद उना में बालूभाई के घर हो आते, जहां से आपने सक्रिय राजनीति में कायदे से पहला कदम रखा था। किसी भी बयान पर आपका ये जेस्चर भारी पड़ता। खासकर इसलिए क्योंकि जिस दलित परिवार के उत्पीड़न के विरोध में आपने उना रैली निकाली और अब सदन तक पहुंचे हैं, वो परिवार चार दिन आपके साथ नहीं टिका। आरएसएस ने उसे अगवा कर लिया।

मेरी बात को अन्यथा मत लीजिएगा। आप चुनावी राजनीति में सोच-समझ कर ही आए होंगे लेकिन इतिहास गवाह है कि चुनावी राजनीति एक से एक बहादुरों को निगल गयी। बड़े-बड़े आंदोलन संसद के ब्लैकहोल में घुस गए। इसलिए, संभल के! छोटी ज़बान, चौड़ी दुकान- संसदीय राजनीति का मंत्र है। आप पर लाखों लोगों को भरोसा है। ध्यान रहे!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है)

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