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नज़रियाः मदरसों में आईये तालीम लीजिये, और दिमाग में भरी गंदगी से छुटकारा पाईये

इस्लाहुद्दीन अंसारी

मदरसों में आतंक की ट्रेनिंग दी जाती है, मदरसे आतंक की फैक्ट्री है, मदरसों में से आतंकी निकलते हैं……. आज कल जहाँ देखिये सत्ताधारी दल के पेड वक्ता और पेड पत्रकार यही मुद्दा लिये मुसलमानों की तरबिरत और तालीम के इन बुनियादी इदारों पर अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाये बैठे हैं। मक़सद वही पुराना है मुसलमानों को तालीम से दूर रखना।

अब जब मदरसे दीनी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम की तरफ़ भी तेजी से अपना कदम बढ़ा रहे हैं जहाँ गरीब से गरीब घर का बच्चा भी अपनी शुरूआती तालीम आसानी से पूरी कर रहा है। जहाँ अब वो अरबी की तालीम के साथ साथ हिंदी और अंग्रेजी की भी तालीम हासिल करके अपने बेहतर मुस्तकबिल की बुनियाद को मजबूत कर रहा है। जहाँ वो पढ़ाई लिखाई के महत्व को समझकर आधुनिक तालीम हासिल करने की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ा रहा है। तब ऐसे में पूरे देश को भगवा रंग से रंग देने का ख़्वाब पाले राष्ट्रवाद के कथित ठेकेदार भला ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं की मदरसों से पढ़ लिखकर निकलने वाला कोई आम सा मुसलमान कोई बड़ा ख्वाब देखे।

उन्हें तक़लीफ़े हैं हमारे बच्चों के एक हाथों में अरबी कायदे और एक हाथ में अंग्रेज़ी की किताबों से। उन्हें तक़लीफ़े हैं कुर्ता, पैजामा और टोपी लगाए बच्चों के कांधों पर टंगे बस्तों से। उन्हें तक़लीफ़े हैं आधुनिक होते इन कौमी इदारों से। उन्हें तक़लीफ़े हैं मदरसों की आधुनिक होती क्लासरूमों से जहाँ मदरसों के मासूम बच्चे अरबी के साथ-साथ अंग्रेज़ी और कंप्यूटर की शिक्षा भी हासिल कर रहें हैं। वो डरने लगे हैं हमारे मदरसों के बच्चों की आंखों पलते बड़े-बड़े ख्वाबों से। वो डरने लगे हैं मदरसों के बच्चों की कामयाबियों से। उन्हें डर सता रहा है की कहीं मदरसों के ये बच्चे उनके उन मंसूबों पर पानी ना फेर दे जो उन्होंने अरसे से अपने दिलों में पाल रखा है।

पहले फरमान जारी किया गया की जश्ने आज़ादी पर मदरसों में तिरंगा फहराकर देशभक्ति को साबित किया जाए। हमने ना केवल तिरंगा फहराया बल्कि आज़ादी के जश्न को इस बेहतरीन तरीके से मनाया की उनकी आंखें फटी की फटी रह गई हमारे मदरसे कौमी तरानों और हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारों से गूंज उठे। हाथों में तिरंगा लिये हमारे मदरसों के मासूम बच्चे वतन की सलामती की दुआएं करते रहें। और आज एक सनकी जिस पर नफ़रत की सनक सवार है वो हमारे इन्हीं मदरसों को जिस पर कल तिरंगा फहराया गया था, जिसमें कल हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारें गूंजे थे, जिन में पढ़ने वाले बच्चों ने मुल्क़ की सलामती के लिये दुआएं की थी, उसे बड़ी बेशर्मी के साथ आतंक की फैक्ट्री बता देता है।

वसीम रिज़वी साहब लगता है आपने कभी मदरसों की चौखट नहीं देखी है जाईये एक बार देखकर आईये देश की तालीमी तरक्क़ी में शाना-ब-शाना साथ चलने वाली इन छोटी-छोटी पाठशालाओं को। जाकर मिलकर आईये मदरसों में पढ़ने वाले इन मासूम बच्चों से, कसम ख़ुदा की उन मासूम बच्चों में हिंदुस्तानियत का जज़्बा खुद से कई गुना ज्यादा पाओगे। क्योंकि वो तुम्हारी तरह वक़्फ की संपत्तियां हड़प कर उस पाप को छिपाने के लिये देशभक्ति का चोला नहीं ओढ़े हुए हैं बल्कि वो निःस्वार्थ और बिना किसी लालच के हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने वाले लोग हैं। जिनकी रगों तुम्हारी तरह मक्कारी नहीं बल्कि हिंदुस्तानियत लहू बनकर दौड़ रही हैं। उन बच्चों का आदर्श कोई ऐरा गैरा नहीं बल्कि उन्हीं की तरह मदरसों से पढ़कर देश के शीर्ष पद को सुशोभित करने वाले ज़ाकिर, फख़रुद्दीन और कलाम जैसे सच्चे देशभक्त लोग हैं।

तुम्हें क्या लगता है तुम्हारी इन सब बकवासों से इन बच्चों और इन मदरसों के हौसले पस्त हो जाएंगें?? तुम इन मदरसों का वजूद मिटा पाने में कामयाब हो जाओगे ?? तुम अपने आकाओं के मंसूबों को पूरा करने में कामयाब हो जाओगे ??  गलत सोंचते हैं आप वसीम रिज़वी साहब दरअसल आपने देश के मदरसों का इतिहास नहीं पढ़ा है शायद वरना ये फिजूल की बकवास करने से पहले आपको पता होता की आज़ादी की जंग से लेकर आज तक़ इन मदरसों का एक सुनहरा इतिहास रहा है।

उस समय फ़िरंगी भी लाख़ कोशिशें कर चुके हैं इन मदरसों को बंद कराने की और कभी उनकी दलाली करने वाले लोग आज भी इसी कोशिशों में दिन रात परेशान हैं की इन मदरसों को बंद कर दिया जाए। पर ना तो कभी फिरंगी अपने मक़सद में कामयाब हो पाए थे और इंशाअल्लाह ना आज नफ़रत वाली ये ताकतें कामयाब हो पाएंगी। हमारे मदरसे इंशाअल्लाह इसी शान से चलते रहे हैं और आगे भी चलते रहेंगे वो कल भी हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते थे और आगे भी वो इसी हिंदुस्तानियत का परचम थामे चलते रहेंगे और बढ़ते रहेंगे बाकि वसीम रिज़वी जैसे लोग तो आते जाते रहते हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्णीकार हैं)

 

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