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चित्र का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्म रूप में किया गया है।

नज़रियाः करणी सेना, और हिंसक हिन्दुवादी संगठन भारतीय लोकतंत्र के ताबूत में कीलें ठोक रहे हैं।

इरफान इंजीनियर

गौरक्षक के नाम से जाने जाने वाले हत्यारों के समूह और वे लोग जो अंतर्धामिक विवाह करने वाले जोड़ों पर हमले करते हैं या अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को जबरन हिन्दू बनाने का प्रयास करते हैं या इस झूठे आरोप में कि वे धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं, अल्पसंख्यकों के धार्मिक कार्यक्रमों के बाधित करते हैं या जो इस आधार पर किसी फिल्म का प्रदर्शन प्रतिबंधित करने की मांग करते हैं क्योंकि वह उनकी भावनाओं को चोट पहुंचाती है – वे सभी हिन्दू राष्ट्र की सेना के सिपाही हैं और अंबेडकरवादी प्रजातांत्रिक राज्य की जड़ों पर प्रहार कर रहे हैं।

करणी सेना, खाप और अन्य जाति-आधारित पंचायतें और बाबाओं का वह तबका, जो हिन्दू श्रेष्ठतावादी विचारधारा में यकीन रखता है, प्रजातंत्र के ताबूत में कीलें ठोंक रहे हैं। परंतु अभी तक वे प्रजातंत्र का गला घोंटने के अपने लक्ष्य से बहुत दूर हैं। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास और विज्ञान का दर्जा देना चाहते हैं और उनके अनुसार, पौराणिक कथाओं में दिया गया विवरण न केवल ऐतिहासिक सच है बल्कि उस पर कोई विवाद या संदेह करने की गुंजाइश भी नहीं है।

जहां खाप पंचायतें और खून की प्यासी भीड़ें अपना काम कर रही हैं, वहीं भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार उनके खिलाफ कार्यवाही न कर या अप्रभावी कार्यवाही कर, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की राह प्रशस्त कर रही है। हिन्दू राष्ट्र के सिपाही अपने वैचारिक गुरू आरएसएस से शिक्षा और प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं। सच यह है कि भाजपा के नियंत्रण वाला राज्य, हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों को कुछ भी और सब कुछ करने की छूट दे रहा है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हिन्दू राष्ट्र में होना चाहिए अर्थात राज्य को हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहकर काम करना चाहिए।

करणी सेना जैसे संगठन, जिन्हें राज्य का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन हासिल है, इतिहास के केवल उस संस्करण को मान्यता देना चाहते हैं जिसमें उनकी जाति को नायक सिद्ध किया गया हो और यह बताया गया हो कि उसके सदस्यों ने ‘शत्रुओं‘ से वीरतापूर्वक मुकाबला किया। ऐसा कर वे न केवल हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में सहयोग कर रहे हैं वरन् वे अपनी जाति के वर्चस्व को बनाए रखने का प्रयास भी कर रहे हैं। वे अपनी राजनैतिक शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं और दलितों व अन्य कमजोर वर्गों को अपने अधीन रखना चाहते हैं।

अंबेडकरवादी प्रजातांत्रिक राज्य, सभी कमजोर वर्गों के साथ ‘सकारात्मक‘ भेदभाव करने का हामी है। इनमें शामिल हैं एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाएं व बच्चे (अनुच्छेद 15 व 16) एवं श्रमिक, किसान व सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से कमजोर सभी वर्ग (राज्य के नीति निदेशक तत्व संबंधी अध्याय)। इसके विपरीत, हिन्दू राष्ट्र केवल जाति-आधारित पदक्रम को बनाए रखना चाहता है और ऊँची जातियों को प्राप्त विशेषाधिकारों को स्थायी बनाना चाहता है। उसकी नीतियां पूंजीवादी वर्ग की समर्थक हैं।

आक्सफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है। जहां सन् 2014 में सबसे धनी एक प्रतिशत भारतीय, 58 प्रतिशत संपत्ति के स्वामी थे, वहीं अब वे 73 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं। गाय का जीवन, दलितों और मुसलमानों के जीवन से अधिक कीमती है। किसानों की बदहाली दूर करने के लिए कुछ किया जाए या नहीं परंतु गाय की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। बेरोजगारों को काम मिले या नहीं परंतु अयोध्या में दिवाली मनाने पर लाखों रूपये खर्च किए जाने चाहिए।

शिक्षा के लिए बजट हो न हो परंतु शिवाजी, भगवान राम और आदि शंकराचार्य की विशाल मूर्तियों के निर्माण पर अरबों रूपये व्यय किए जाने चाहिए। बच्चों को मध्यान्ह भोजन मिले न मिले बाबाओं के लिए लंबी विदेशी गाड़ियों की व्यवस्था होनी चाहिए। महिलाएं सुरक्षित हों न हों, समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए और अल्पसंख्यकों का ‘राष्ट्रीयकरण‘ किया जाना चाहिए। देष में आज हिन्दू राष्ट्र के अधीन राज्य और अंबेडकरवादी प्रजातांत्रिक राज्य के बीच मुकाबला चल रहा है। आप किस तरफ हैं?

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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