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शख्सियतः जब रोते बच्चों को भी हंसा गए थे मेरे ‘स्माइल मैन’

जनवरी 2015: लगभग साढ़े बारह बजे का समय था, पश्चिमी भारत स्थित महाराष्ट्र के लोनी इलाके में समुद्र किनारे करीब 30,000 ग्रामीण इकट्ठा हुए थे। यह इलाका पवित्र शहर शिरडी से करीब 150 किमी दूर है।

उस वक्त वहां कड़ी धूप निकली थी और जैसे-जैसे समय बीत रहा था लोग सीधी धूप और गर्मी से सिमटकर छांव वाले क्षेत्र में आ रहे थे। ये सभी मिसाइल मैन डॉ. अब्दुल कलाम को देखने आए थे जो प्रवारानगर रूरल एजुकेशन सोसाइटी की 50 वीं वर्षगांठ पूरे होने पर वहां आमंत्रित किए गए थे। इसकी स्थापना प्रसिद्ध नेता व कृषि सुधारक पद्मश्री विठ्ठलराव विखे पाटिल ने की थी जो भारत में कॉर्पोरेटिव शुगर फैक्ट्री के भी संस्थापक थे।

उस दौर में शुरू हुआ आंदोलन अब मेडिकल और इंजीनियर कॉलेज, अस्पताल, स्कूल, ट्रेनिंग सेंटर, बैंक में बदल चुका था। इसकी देख-रेख अब उनके पोते डॉ. अशोक पाटिल कर रहे थे। डॉ. अशोक कलाम साहब के अच्छे मित्र भी थे।

बैकस्टेज करीब 50 बच्चे कलाम के आगमन पर अपनी परफॉर्मेंस की रिहर्सल कर रहे थे। उस समय तीन डांस परफॉर्मेंस की योजना की गई थी। इनमें दो शास्त्रीय नृत्य और तीसरा देशभक्ति गानों पर भारत की विविध संस्कृति को दिखाते हुए थी। हर परफॉर्मेंस के लिए पांच मिनट का वक्त रखा गया था और 20 मिनट डॉ. अशोक की वेलकम स्पीच के लिए। कलाम साहब वैसे तो हमेशा समय पर पहुंचने में यकीन रखते थे लेकिन उस दिन दुर्भाग्यवश हमारी फ्लाइट लेट हो गई थी।

मुंबई लैंड करने के बाद हम कई लोकल मीटिंग में बिजी हो गए और हमारे पायलट ने ठीक साढ़े चार बजे वापस आने को कहा था। डॉ. कलाम जब कार्यक्रम स्थल में पहुंचे तो मैंने ध्यान दिया कि हमारे एक घंटे से ज्यादा का वक्त नहीं है। शुरुआत डॉ. अशोक पाटिल के स्वागत भाषण से हुई। समय की कमी को ध्यान में रखते हुए ऑर्गनाइजर और मैंने अशोक पाटिल से बातचीत करके प्लान किया कि कलाम साहब को अपने सभी बिंदुओं पर बात करने के लिए कम से कम 25 से 30 मिनट चाहिए इसलिए आखिरी परफॉर्मेंस जिसमें करीब 20 बच्चे शामिल थे उसे उस वक्त कैंसिल कर दिया गया और तय हुआ कि जब कलाम साहब के लंच के लिए जाने के बाद आखिरी परफॉर्मेंस होगी।

मेरे लिए यह एक बेहद कठोर कदम था लेकिन इस तरह हम 10 मिनट का समय बचा पा रहे थे। इस दौरान ग्रामीणों से बात करना भी जरूरी था। मैं डॉ. कलाम के पास उनका कॉलर माइक लगाने के लिए गया और बोला कि हमने समय बचाने के लिए आखिरी परफॉर्मेंस फिलहाल कैंसिल कर दी है इसलिए आप अपने महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आराम से बात रख सकते हैं। उन्होंने मेरी तरफ आश्चर्य से देखा और कहा, ‘और उन बच्चों का क्या? मैंने जवाब दिया, ‘वे आपके जाने के बाद परफॉर्म करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘आह ! और तुम्हें लगता है कि ये आइडिया वाकई काम करेगा?’ वह सही थे। मैं जानता था कि एक बार वे जब मंच छोड़ देंगे पूरी भीड़ भी उनके साथ रुखसत कर जाएगी।

आधे घंटे तक कलाम ने ग्रामीणों से अपनी बात रखी और गांवों के विकास की बात की। इसके बाद हम वहां से पास ही स्थित एक बिल्डिंग में लंच के लिए गए। हमारे पास समय कम था इसलिए हम जल्दी में सिर्फ औपचारिकता कर पा रहे थे। यहां डाइनिंग टेबल पर उनका पसंदीदा भिंडी, प्याज की पकौड़ी और दही डाइनिंग टेबल पर सजा हुआ था लेकिन कलाम साहब मन में कुछ और बात सोच रहे थे।

अचानक डॉ. कलाम अशोक पाटिल की तरफ मुड़े और बोले, ‘मेरी एक गुजारिश है। हम जल्दी लंच करके समय बचा सकते हैं लेकिन पहले क्या आप उन बच्चों को बुला सकते हैं जिनकी परफॉर्मेंस मेरी वजह से रह गई? मुझे यकीन है कि वे सभी बहुत उदास होंगे। उनके साथ सही नहीं हुआ। मैं उन्हें मिलकर सांत्वना देना चाहता हूं।’ लंच के लिए वहां करीब 10 लोग मौजूद थे जो उनकी इस संवेदनशील बात को सुनकर रुक गए। डॉ. पाटिल ने आदेश देकर उन बच्चों को बुलवाया।

पांच मिनट में करीब 15 से 20 बच्चे पूरे मेकअप और कलरफुल ड्रेस के साथ कमरे के बाहर मौजूद थे। कलाम सही थे। वे सभी थोड़े उदास थे उनमें सबसे छोटा एक बच्चा रो भी रहा था। छोटी बच्चियों का मेकअप और आंखों का मस्कारा बहकर पूरे चेहरे पर आ गया था। वे सब सिसकियां भर रहे थे। जैसे ही उन्होंने कलाम साहब को अपनी ओर आते देखा तो वे भावुक होकर और ज़ोर से रोने लगे। मुझे बताया गया कि वे सभी बच्चे महीने भर से इस परफॉर्मेंस की तैयारी कर रहे थे। कलाम साहब ने उन सबसे हाथ मिलाया और उन्हें ऑटोग्राफ दिया।

डॉ. कलाम ने बच्चों से मिलने के लिए पांच मिनट का समय मांगा था लेकिन बच्चों से बात करते-करते समय पांच मिनट से ज्यादा हो गया और यहां तक कि उन्होंने अपना लंच भी छोड़ दिया। कलाम साहब ने बच्चों के नाम पूछे और फोटोग्राफ क्लिक करवाईं। जब हम जाने को हुए तो डॉ. अशोक पाटिल ने कहा, ‘परफॉर्मेंस न दे पाने के बावजूद ये बच्चे सबसे खुशकिस्मत निकले जिन्हें आप के साथ प्रत्यक्ष रूप से समय बिताने का अवसर मिला।’ ये सुनकर सभी बच्चे आंसू पोंछकर खिलखिलाकर हंसने लगे। – कुछ ऐसे थे मेरे महान मिसाइल मैन या मैं कहूं- स्माइल मैन

( डॉ. अब्दुल कलाम के शिष्य सृजन पाल सिंह की नई किताब वॉट कैन आई गिव किताब का अंश )

सभार गांव कनेक्शन

 

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