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जानिये- लाख कोशिशों के बावजूद भी कमाल अतातुर्क क्यों नहीं खत्म कर पाये थे तुर्की से इस्लामिक सभ्यता?

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इमरोज़ खान

कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफ़ा कमाल पाशा को आधुनिक तुर्की का निर्माता माना जाता है, पश्चिमी दुनिया और गैर मुस्लिमो के बीच उन्हें समाज सुधारक और इस्लाम के अगुवाकर बने तुर्की को सेकुलर राष्ट्र बनाने का श्रेय जाता है हालांकि इस्लामी जगत उन्हें खलनायक के रूप में लेती है.

दुनिया भर में इस्लामिक ताकत के रूप में जाने जाना वाला तुर्की ओटोमन साम्राज्य की हुकुमत में अपने आखिरी दिनों में भी एक ताकत के रूप में माना जाता रहा था लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के एलान और उसमें खुद जर्मनी का सहयोगी बनकर हिस्सा लेने के बाद इस्लामिक तुर्की का वजूद ही मिट गया था. इसके पीछे तुर्की में चल रहे आंदोलन जिसके अगवा युवा और नौजवान थे जो कि ओटोमन शासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे वही ओटोमन साम्राज्य के अरब आबादी वाली हिस्सों में बगावत ने इंग्लैंड का काम आसान कर दिया.

आखिर में 630 साल तक यूरोप को अपनी ताकत का एहसास का कराने वाले इस हुकुमत का खात्मा हो गया, तुर्की में हो रहे इस परिवर्तन में सत्ता अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा के हाथ लगी, सत्ता पर बैठने से पहले अतातुर्क को तुर्क इस्लाम के मूल्यों पर चलने वाला ऐसा जाबांज तुर्क मानते थे जोकि आधुनिक विचारो वाला है और जो तुर्की को यूरोप जैसे देशो के तरह विकसित कर देंगे.

कमाल अतातुर्क की शख्सियत

अतार्तुर्क एक बेहतर राजनेता थे,उन्होने सत्ता पर बैठते ही खिलाफत का खात्मा कर दिया, ओटोमन साम्राज्य के इस अधिकारिक खात्मे की प्रतक्रिया दुनिया के कई मुस्लिम देशो में विरोध प्रदर्शन के रूप में सामने आया. कमाल पाशा ने पहले तो मस्जिदों के इमामो को वेतन में भारी इजाफा किया और तुर्की की विश्व युद्ध में हार की ज़िम्मेदारी ओटोमन साम्राज्य के आखरी शासक पर डाल दी.

सत्ता पर पकड बनाने के बाद कमाल ने तुर्की को सेकुलर राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक संसद में रखा. अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने किसी का विरोध नही सुना और विधेयक पारित करवाने के लिए सांसदों पर दवाब डाला गया जिसके बाद विधेयक पारित हो गया.

कमाल पाशा ने इसके बाद तुर्की में महिलाओ के सार्वजनिक ज़गहो पर बुर्का पहनने पर बैन लगा दिया,इस्तांबुल की सोफिया मस्जिद को एक म्यूजियम में बदल दिया गया. कुछ ही दिनों में अतातुर्क ने तुर्की की जनता से पारम्परिक रूप से पहने जाने वाले पहनावे को छोड़कर पश्चिमी पहनावे को पहनने का आदेश दिया गया,रातो रात ये बदलाव लागू किया गया.

अतातुर्क यही नहीं रुके,कमाल पाशा ने अरबी भाषा में लिखी गई कुरान और नमाज़ को तुर्की भाषा में ही रूपांतरित करने जैसे विवादित फरमान जारी कर दिए. एक के बाद एक इस्लाम पर बंदिशों के फरमान के बाद तुर्की में कई ज़गह बगावत होती है लेकिन अतातुर्क ने अपनी राजनैतिक और हिकमते अमली से सभी कोशिशो को नाकाम कर दिया.

अतातुर्क ने तुर्की की सेना में भी अपने द्वारा परिभाषित सेकुलरिज्म के सिद्धांत का मजबूत ताना बाना बुना, दस नवम्बर 1938 को उनकी मृत्यू हो जाती है. लेकिन इतनी ज्यादा कोशिशो के बाद भी 1960,1971,1980 में चुनावों में इस्लामिक पार्टियों ने चुनाव में सफलता पाई, ये सरकारे अधिक दिन काम नही कर पाई जल्द ही सेना ने चुनी हुई सरकारों का तख्ता पलट कर दिया और शासन अपने अधिकार में ले लिया. इन तख्तापलट को तुर्की के सेकुलर स्वरुप को बचाने का प्रयास कहके सेना ने सही ठहराया.

दरअसल कमाल अतातुर्क और उनके बाद उनके अनुयाईयों ने तुर्की में इस्लामिक सभ्यता को खत्म करने का प्रयास किया था वो सिर्फ बड़े शहरो खासकर इस्तांबुल और अंकारा में ही सफल था, ग्रामीण हिस्सों में वहां की जनता उसी तरह से इस्लाम का पालन कर रही थी जैसा दूसरे किसी मुस्लिम देश में किया जाता था.

सीमित रूप से ही सफल हो पाये उनके उसूल

कहने का अर्थ ये है कि अतातुर्क के बनाये हुए उसूल सीमित रूप से ही सफल हुए थे,1990 तक तुर्की में आर्थिक हालात भी खराब हो गई थी. 1994 में तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में मेयर के चुनाव में इस्लामिक पार्टी के रजब तैय्याब एर्दोगान चुनाव जीत गये. ये अपने आप में आश्चर्यचकित करने वाली घटना थी. सेना और सरकार को इस बात का कतई अंदेशा नही था कि तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में ही इस्लामिक पार्टी का मेयर चुनाव जीत सकता है लेकिन एर्दोगान को 1998 में मेयर पद से हटा दिया गया है,जिसके साथ ही उनकी  सभी राजनैतिक गतिविधि पर भी प्रतिबंध लगाने के साथ चार महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई.

इसके बाद एर्दोगान अपनी इस्लामिक पार्टी को भंग करके कुछ सालो बाद AKP नाम की नई पार्टी बनाई, और खुद की छवी को सेकुलर नेता की छवि धारण कर लिया। यह एक तरह से उनकी वैसी ही चाल थी जैसी अतातुर्क ने इस्लामिक तुर्की को सेकुलर तुर्की बनाने की चाल चली थी, बस इस बार सेकुलर तुर्की को धीरे धीरे इस्लामिक स्वरुप में लौटना था.

जब एक तरफा जीते एर्दोगान

2002 के चुनाव में AKP को एकतरफा जीत मिली, लेकिन एर्दोगान पर राजनैतिक रूप से काम करने पर प्रतिबंध था इस कारण अब्दुल्लाह गुल को प्रधानमंत्री बनाया गया,अब्दुल्लाह गुल की सरकार ने एर्दोगान के ऊपर लगे प्रतिबंध को हटा दिया और 2003 में रजब तैय्यब एर्दोगान को प्रधानमंत्री बनाया गया।

इसके बाद सभी चुनावों में एर्दोगान की पार्टी को एक के बाद एक बड़ी जीत मिलती रही, शुरुआत में सेना ने एर्दोगान के कई फैसलों का विरोध किया लेकिन जनता का जनसमर्थन एर्दोगान की तरफ इतना ज्यादा था कि सेना सिर्फ धमकी ही देती रही तख्ता पलट की हिम्मत नही जुटा सकी, इसकी एक बड़ी वजह तुर्की में आर्थिक सुधार भी था, तुर्की की इकॉनमी एक बार फिर तेज़ इजाफे के साथ आगे बढने लगी.

एक बड़ी वजह एर्दोगान की दमदार भाषण थे इसके अलावा एर्दोगान ने तुर्कीं के उन सुनहरे इतिहासों को नौजवानों को दिखाया जिसको अतातुर्क की समर्थित आर्मी डस्टबिन में डाल चुकी थी, एक के बाद एक कई इस्लाम पर बंदिशों वाले फैसले पलटने शुरू हुए लेकिन गैरमुस्लिम पर किसी भी तरह के अत्याचार को एर्दोगान ने बर्दाश्त नहीं किया.

एर्दोगान ने संविधान में संशोधन को अपने जाती फायदे के लिए भी बदला, दो बार प्रधानमंत्री बनने के बाद वे राष्ट्रपति बने, 2016 में एक बार फिर सेना ने तुर्की में एर्दोगान सरकार के खिलाफ विद्रोह किया लेकिन यह विद्रोह असफल हो गया. असफल विद्रोह के बाद रजब तैय्यिप ने संविधान में बड़े बदलाव किये और बगावत करने वालों के खिलाफ बेहद कड़ी कार्यवाई की जिसकी कई देशो ने ये कहकर निंदा कि तुर्की सरकार की इस कार्रावाई से मानवाधिकार उल्लंघन हो रहा है.

लेकिन एर्दोगान अब कहां किसी की सुनने वाले हैं उनके आलोचक खौफजदा हैं कि अभी सेकुलर रूप से इस्लाम अपना कर चलने वाला तुर्की धीरे धीरे कहीं सेकुलर स्वरुप को पूरी तरह त्याग कर सिर्फ इस्लामिक गणतंत्र ही न बन जाये.

(लेखक हेडलाईन 24 हिन्दी के संपादक हैं।)