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यादों में सफदरः मियां किस-किस को रोकोगे हमारा ज़िक्र करने से, हमारे ख़ून की लाली झलकती है फ़जाओं में

फ़ानी जोधपुरी

जब भी दलील के साथ उठने वाली आवाज़ को डराया-धमकाया जाए तो सफ़दर हाशमी जैसी शख़्सियत की ज़रूरत महसूस की जाने लगती है। सफ़दर हाशमी ऐसी शख़्सियत थे जिनको सच कहने पे मौत मिली,सफ़दर हाशमी एक पैदाइशी ड्रामाअदाकार (रंगकर्मी) थे।

12 अप्रेल 1954 में सफ़दर हाशमी दिल्ली में पैदा हुए उनकी शुरूआती ज़िन्दगी अलीगढ़ में गुज़री मगर बाद में दिल्ली आ बसे और दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से अंग्रेज़ी में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन क़िया यही वो दौर था जब सफ़दर स्टूडेंट फ़ैडरेशन की कल्चर यूनिट से जुड़े और इप्टा से भी।

हाशमी कम्युनिस्ट पार्टी के मेम्बर थे और 1979 में अपनी कम्युनिस्ट साथी कामरेड मौली श्री से शादी की। सफ़दर हाशमी की ज़िन्दगी उनके दो नाटकों के इर्द-गिर्द है एक तो मैक्सिम गोर्की के नाटक दुश्मन पर और दूसरी प्रेमचंद की कहानी मोटेराम के सत्याग्रह मबनी (आधारित) थे। सफ़दर हाशमी ने 1978 में जन नाट्य मंच को मंज़रे-आम पर लाए और आम मज़दूरों की आवाज़ों को सिस्टम चलाने वाले कानों तक पहुँचाया।

सफ़दर हाशमी पूँजीवादियों की आँखों की किरकिरी और मज़दूरों के लिए उनकी आवाज़ को उबारने वाले थे। सफ़दर हाशमी का एक नाटक ‘हल्ला बोल’ उस वक़्त लोगों को अपने एहसासात की तर्जुमानी लगा और सिस्टम को एक नया ख़तरा जो कभी भी एक इंकलाब बन सकता था।

2 जनवरी 1989 को दिल्ली के साहिबाबाद में नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ खेलते वक़्त उनको शहीद कर दिया गया। सफ़दर हाशमी के भाई सोहेल हाशमी,उनके परिवार और दोस्तों को उनके क़ातिलों को सज़ा दिलवाने में 14 साल लग गए। मगर उस वक़्त सबसे बोल्ड क़दम उठाया उनकी शरीक़े-हयात मौली श्री ने जिन्होंने सफ़दर हाशमी की मौत के 48 घंटे बाद यानी 4 जनवरी को वहीं जाकर ‘हल्ला बोल’ नाटक खेला जहाँ वो हलाक़ किए गए और काले सिस्टम के काले औराक़ पर लिख दिया ‘ सफ़दर हाशमी की आवाज़ कभी मारा नहीं जा सकता’ मेरी ख़िराजे-अक़ीदत ऐसे फ़नकार को जो वैसी ही ज़िन्दगी जीते थे जैसे वो ख़ुद अन्दर से थे।

मियाँ किस-किस को रोकोगे हमारा ज़िक्र करने से

हमारे ख़ून की लाली झलकती है फ़जाओं में

(लेखक नौजवान शायर हैं)

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