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क्या आपने फिलिस्तीन की बहादुर बच्ची आहेद तामिमी का नाम सुना है? अगर नहीं, तो जानिए!

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प्रोफेसर अपूर्वानंद

क्या आपने आहेद तामिमी का नाम सुना है? अगर नहीं, तो इसमें आपका कोई दोष भले न हो लेकिन इससे यह पता चलता है कि आप क्या जानना चाहते हैं और क्या जानने में आपकी रुचि नहीं है। कह सकते हैं कि यह जानना किसी के बताने पर ही निर्भर है क्योंकि सब कुछ अकेले दम पर जानना मुमकिन नहीं। फिर यह सवाल उठेगा कि बताने का काम करने वाली संस्थाएँ क्या अपना काम बखूबी कर रही हैं? अगर हां, तो आपको उन्होंने आहेद तामिमी के बारे में क्यों नहीं बताया? उन्हीं सस्थाओं ने जिन्होंने आपको मलाला युसुफजई के बारे में लगातार बाखबर रखा?

यह सवाल हम हिंदी, एक भारतीय भाषा में कर रहे हैं। जाहिर है इस सवाल का दायरा भारत या अधिक से अधिक दक्षिण एशिया है। शेनिला खोजा मूलजी ने यही सवाल अंग्रेज़ी में किया है और उनका लक्ष्य पश्चिम है। हम जानते हैं कि पश्चिम का दायरा बहुत बड़ा है। इसलिए शेनिला का सवाल यूरोप और अमरीका, सबसे से है और उस रास्ते हमसे भी, जो पश्चिम या अंग्रेज़ी के रास्ते बहुत सारी चीज़ों से वाकिफ होते हैं और उनके मुताबिक सहमत और असहमत भी होते हैं।

कौन हैं आहेद तामिमी

आहेद तामिमी एक 16 साल की फिलिस्तीनी बच्ची है। उसे हाल में इजरायली सेना और सीमा पुलिस ने उसके घर पर भोर के ठीक पहले छापा मार कर गिरफ्तार किया। आहेद के पिता बासिम ने बताया कि सुबह 3 बजे पूरे परिवार की नींद अचानक खुली जब उन्होंने दरवाजा पीटने का शोर सुना। दरवाज़ा खोलते ही इजरायली फौज और पुलिस के लोग उन्हें धकेलते हुए घर में घुस आए और सारा सामान तहस नहस कर दिया। उसके बाद उन्होंने आहेद को गिरफ्तार कर लिया। उसे हथकड़ी लगाकर फौज की गाड़ी में ले जाया गया। दोपहर में जब आहेद की मां नरीमन पश्चिमी किनारे के जेरुसलम जिले के जाबा गांव के थाने में बंद की गई आहेद से मिलने गईं ताकि उसके साथ की जा रही पूछ ताछ के दौरान मौजूद रहें तो उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।

नरीमन के पति और आहेद के पिता बासीम खुद कई बार पहले गिरफ्तार किए जा चुके है और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2012 में उन्हें ऐसी ही एक गिरफ्तारी के दौरान प्रिजनर ऑफ़ कांशेंस का दर्जा दिया था। इसका अर्थ यह है कि तामिमी परिवार पश्चिमी किनारे पर इजरायली कब्जे के विरोध में पहले से शरीक और पेश-पेश रहा है।

क्या हैं आहेद पर इल्जाम

आहेद पर इल्जाम यह है कि उसने फौज के काम के दौरान अड़ंगा डाला और फौजियों पर हमला किया। एक वीडियो में आहेद दो फौजियों को डांटती हुई और उन्हें धक्का देती, उन्हें थप्पड़ मारते दिखलाई पड़ रही हैं। माँ नरीमन और एक बहन साथ में हैं। वे दोनों फौजी आहेद को जवाब नहीं दे रहे हैं और न उस पर जवाबी हमला कर रहे हैं। उनके इस संयम को न सिर्फ इजरायल में बल्कि पूरी दुनिया में नोट किया गया। इजरायल में इस संयम के लिए इन फौजियों की आलोचना की जा रही है। लेकिन द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसके लिए उनकी प्रशंसा की। लेकिन यह सब कुछ एक वाकये का हिस्सा है जिसका पिछला भाग वीडियो में नहीं है। जो नहीं रिकॉर्ड हुआ वह यह कि फौजियों ने आहेद के भाई,14 साल के मोहम्मद को ऐन सामने से चेहरे पर रबर की गोली मारी और उसके गहरे ज़ख्म के चलते उसे बहत्तर घन्टों तक बेहोश रखना पड़ा। आहेद इस क्रूरता के बाद उन दो फौजियों को अपने घर से दूर जाने को कह रही हैं।

क्या कहते हैं बासिम के पिता

बासिम के पिता ने बताया कि वे फौजी खुद मोहम्मद को गोली मारने के बाद उसकी क्रूरता से इस कदर सदमे में थे कि आहेद का विरोध नहीं कर पाए। जो हो, यह तथ्य है उन्होंने आहेद ,उनकी माँ और बहन के विरोध का जवाब हिंसा से नहीं दिया। बैतुलमकुद्दस को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के हाल के अमरीका के ऐलान के बाद नए सिरे से फिलस्तीनियों के विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इसका लाभ उठाकर नए सिरे से इजरायली सेना और पुलिस फिलस्तीनियों के घरों में घुसकर उन्हें गिरफ्तार कर रही है। फिलस्तीनी विरोध करें या नहीं? बासीम ने ठीक ही कहा अपनी ज़मीन पर इजरायली दखलंदाजी के खिलाफ प्रतिरोध का उन्हें पूरा हक है, “हम कब्जे के दौरान सामान्य हालात में नहीं रह सकते। प्रतिरोध के अलावा हमारे पास चारा नहीं है।”

आहेद और उनकी माँ की गिरफ्तारी के बाद इजरायल की शिक्षा मंत्री ने कहा है कि उन दोनों की पूरी ज़िंदगी जेल में गुजरनी चाहिए। अदालत ने भी तीनों की हिरासत की अवधि बढ़ा दी है क्योंकि उसे इस आशंका से वह असहमत नहीं हो पाई कि आहेद आगे भी हिंसा कर सकती हैं। इजरायल के प्रमुख अखबार हारेत्ज़ ने अपने एक संपादकीय में इजरायली सैनिकों के संयम की तारीफ़ करते हुए यह लिखा है कि आहेद की गिरफ्तारी और उसे जेल में लम्बे वक्त तक रखने की जिद की वजह यह है कि सरकार घरेलू जनमत को जो कि कट्टर फिलस्तीन विरोध से ग्रस्त है,संतुष्ट करना चाहती है। आहेद के प्रतिरोध को समझने की ज़रुरत है।

मलाला और आहेद

अखबार लिखता है आहेद ने अपने घर पर हमले का प्रतिरोध में न्यूनतम बल का प्रयोग किया है। यह न भूलना चाहिए कि कुछ मिनट पहले ही उसके भाई को इन फौजियों ने चेहरे पर गोली मारी थी। इसके बाद भी आख़िरकार,वह खाली हाथ ही उन दो हथियारबंद इजरायली फौजियों के सामने आ खड़ी हुई। यह एक तरह का दुस्साहस था जिसकी प्रशंसा ही की जा सकती है।हारेत्ज़ ठीक ही लिखता है कि ऐसा कोई भी सैनिक कब्जा नहीं है जिसका उनकी तरफ से, जिन पर कब्जा जमाया गया है उचित और समझ में आने वाला प्रतिरोध न हो। फिलिस्तीनियों को अपने ऊपर इजरायली कब्जे का विरोध करने का जायज़ हक है।

अखबार आगे कहता है कि प्रतिरोध की अब तक की जानी हुई संभावनाओं को ध्यान में रखें तो आहेद ने एक बहुत कम हिंसक रास्ता चुना। उनके उस “हिंसक” प्रतिरोध से सनिकों को किसी भी किस्म के शारीरिक नुकसान का कोई अंदेशा न था।आहेद तामिमी के बारे में लेकिन पश्चिम के प्रेस में शायद ही कुछ लिखा जा रहा हो। शेनिला कहती हैं कि मलाला भी एक तरह की हिंसा का विरोध कर रही थीं। उनकी और उनके समाज की ज़िंदगी पर तालिबान ने कब्जा कर रखा था। उनके प्रतिरोध के पक्ष में पूरी दुनिया खड़ी हुई जैसा उसे करना चाहिए था।लेकिन उसी दुनिया के लिए आहेद के प्रतिरोध की कोई कीमत नहीं है।मलाला को पश्चिमी मानवाधिकार या स्त्री अधिकारों के पैरोकारों का जो समर्थन मिला वह आखिर आहेद के लिए क्यों नहीं है?

आहेद के प्रतिरोध और मलाला के प्रतिरोध में क्या गुणात्मक अंतर है? माना गया कि मलाला और उनके परिवार का प्रतिरोध इसलिए असाधारण था कि उनका मुकाबला दहशतगर्दों से था।शायद इसलिए भी वह असाधारण माना गया कि कि वे एक रुढ़िवाद से भी लड़ रही थीं जो स्त्रियों के पढ़ने को अपराध और धर्म विरोधी मानता है।मुसलमान औरत,अगर, वह इस्लामी रुढ़िवाद या कट्टरपन से लड़ रही हो तो हिरोइन के तौर पर मशहूर हो सकती है लेकिन अगर वह इजरायली राजकीय हिंसा से लड़ रही हो तो वह मुसलमान ही रह जाती है।

क्या फर्क है दोनों में

आहेद फिलस्तीनी है,मलाला की तरह ही आजादीपसंद है, मलाला की तरह ही वह हिंसा की विरोधी है लकिन उसके साथ पश्चिमी या हमारी निगाह की दिक्कत यह है कि हम उसके प्रतिरोध को एक सिर्फ एक स्त्री या लड़की का लड़की होने के कारण किया गया प्रतिरोध नहीं मान पाते। दूसरे,उसका प्रतिरोध एक स्तर पर उसके समुदाय का प्रतिरोध भी है जिसमें उसके पिता जैसे लोग भी शामिल हैं। तीसरे, अब हमने फिलिस्तीन के प्रतिरोध को आज़ादी का संघर्ष मानना भी छोड़ दिया है।

मलाला ने हिंसा के खिलाफ असाधारण साहस का परिचय दिया। 16 साल की आहेद कई बरस से इजरायली कब्जे का प्रतिरोध कर रही है।वह अपनी ज़मीन और पानी की इजरायली लूट का विरोध करती आ रही है। उसने एक चाचा और एक भाई को गँवाया है। इस बार भी वह अपने छोटे भाई पर हमले के खिलाफ ही जा खड़ी हुई थी। निहत्थी, एक ऐसी फौज के दो सदस्यों के सामने जो फिलिस्तीन और मुस्लिम या अरब विरोधी घृणा पर ही पाली पोसी गई है।

ऐसा करके वे भारी खतरा मोल ले रही थीं।अगर इन दो फौजियों ने उनके “उकसावे” का कोई हिंसक प्रत्युत्तर न दिया तो इसका कारण सिर्फ यही माना जा सकता है कि अपनी हिंसा के परिणाम को ठीक सामने देखकर वे स्तंभित हो गए थे।यह विचारधारा के समक्ष निरी मानवीयता के जग पड़ने का एक अपवाद-क्षण था। फिर भी हमें इन फौजियों की इस इंसानी हिचकिचाहट को सलाम करना चाहिए क्योंकि उन्हें यह पता था कि फिलस्तीनी खून के प्यासे राष्ट्रवाद का उन्हें सामना करना होगा।

इजरायल का भला हो अगर उनकी यह इंसानियत का यह लम्हा अपवाद भर न रहे। हम इस इंसानियत का जश्न ज़रूर मनाएं लेकिन अपनी निगाह से आहेद की वीरता और उसकी अनिवार्यता को ओझल न होने दें शेनिला का यह सवाल इसीलिए गूंजते रहना चाहिए कि अगर मलाला बहादुर है तो आहेद क्यों नहीं ?

(लेखक दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफेसर हैं यह लेख नवजीवन से सभार लिया गया है)