Breaking News
Home / पड़ताल / जन्मदिन विशेषः मिर्जा ग़ालिब, ‘बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला’!

जन्मदिन विशेषः मिर्जा ग़ालिब, ‘बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला’!

ध्रुव गुप्त

भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में बस कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। निर्विवाद रूप से मिर्ज़ा ग़ालिब उनमें से एक हैं। मनुष्यता और प्रेम की तलाश, शाश्वत तृष्णा, गहन प्यास, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के अनुभव-संसार और सौंदर्यबोध से गुज़रना कविता-प्रेमियों के लिए आज भी अत्यंत दुर्लभ अनुभव है।

लफ़्ज़ों में अनुभूतियों की परतें इतनी कि जितनी बार पढ़ो, उनके नए-नए अर्थ खुलते जाते हैं। वैसे तो हर शायर की कृतियां अपने समय का दस्तावेज़ होती हैं, लेकिन अपने समय की पीडाओं की नक्काशी का ग़ालिब का अंदाज़ भी अलग था और तेवर भी जुदा। उनकी शायरी को फ़ारसी और उर्दू शायरी में परंपरागत विषयों से प्रस्थान के रूप में देखा जाता है, जहां कोई रूढ़ जीवन-मूल्य, बंधी-बंधाई जीवन-शैली या स्थापित जीवन-दर्शन नहीं है। रूढ़ियों का अतिक्रमण वहां जीवन-मूल्य है, आवारगी जीवन-शैली और अंतर्विरोध जीवन-दर्शन।

ग़ालिब के पुरानी दिल्ली के गली क़ासिम जान, बल्लीमारन स्थित हवेली में आज युवा कवि नित्यानंद गायेन के साथ पूरा दिन गुज़ारा। वह हवेली जिसमें ज़िन्दगी की तमाम दुश्वारियों से टकराते हुए ग़ालिब ने अपनी ज़िन्दगी के आखिरी नौ साल गुज़ारे।

चौतरफ़ा अतिक्रमण की शिकार मुगलकालीन शैली में बनी इस ऐतिहासिक हवेली को वर्ष 1999 में सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर ‌इसका जीर्णोद्धार कराया। हवेली में ‘चंद तस्वीरे बुतां, चंद हसीनों के ख़तूत’ तो अब यादें ही बन चुकी हैं, लेकिन उनकी सीली-सीली ख़ुशबू हवेली के कोने-कोने में महसूस होती रही। यहां के चप्पे-चप्पे पर उस उदासी, तन्हाई, बेचैनी और अधूरेपन का भी अहसास होता है जिसने ग़ालिब को ग़ालिब बनाया। ‘दबीर-उल-मुल्क’ और ‘नज़्म-उद-दौला’ के खिताब से नवाजे गए उर्दू के इस सर्वकालीन महानतम शायर के यौमे पैदाईश (27 दिसंबर) पर खेराज़-ए-अक़ीदत, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !

तस्कीं को हम न रोएं जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले

हूरान-ए-ख़ुल्द में तिरी सूरत मगर मिले

 

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल

मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूं तेरा घर मिले

 

साक़ी-गरी की शर्म करो आज वर्ना हम

हर शब पिया ही करते हैं मय जिस क़दर मिले

 

तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम

मेरा सलाम कहियो अगर नामा-बर मिले

 

तुम को भी हम दिखाएं कि मजनूं ने क्या किया

फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिनहां से गर मिले

 

लाज़िम नहीं कि ख़िज़्र की हम पैरवी करें

जाना कि इक बुज़ुर्ग हमें हम-सफ़र मिले

 

ऐ साकिनान-ए-कूचा-ए-दिलदार देखना

तुम को कहीं जो ग़ालिब‘-ए-आशुफ़्ता-सर मिले

 

Check Also

टाइम्स नाउ पर PM मोदी के इंटरव्यूः रवीश ने पूछा ‘क्या प्रधानमंत्री कुछ भी बोल देते हैं’ ?

Share this on WhatsAppरवीश कुमार प्रधानमंत्री ने टाइम्स नाउ से कहा कि आज भारत के …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *