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जन्मदिन विशेषः तुम्हारे बाद इतना सन्नाटा क्यों है, गब्बर ?

ध्रुव गुप्त

कोई अभिनेता एक फिल्म से भी अमरत्व हासिल कर सकता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण मरहूम अमजद खान हैं। वैसे तो अमजद ने दर्जनों फिल्मों में खलनायक, सहनायक और चरित्र अभिनेता की विविध भूमिकाएं की, लेकिन याद उन्हें ‘शोले’ में गब्बर सिंह की भूमिका के लिए ही किया जाता है।

हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने किसी डाकू का इतना खूंखार और नृशंस चरित्र न पहले कभी देखा था और न उसके बाद कभी देख पाए। एक ऐसा चरित्र जिसकी एक-एक हरकत उसके जीवनकाल में ही मिथक बन गई। एक ऐसी संवाद-शैली जो देखने-सुनने वालों की सांसें रोक दे और रोंगटें खड़ी कर दे।

गब्बर की भूमिका शायद अमजद के लिए ही लिखी गई थी और अमजद शायद गब्बर बनने के लिए ही पैदा हुए थे। गब्बर की अपार जनप्रियता देखने के बाद वे गुज़र भी गए। वे प्राण के बाद दूसरे ऐसे खलनायक हैं जिनसे लोग डरते भी हैं और बेपनाह प्यार भी करते हैं। पचास-पचास साल बाद भी जब कोई खलनायक सिनेमा के परदे पर बड़ी-बड़ी डींगें हांकेगा तो लोग कहेंगे कि चुप हो जा बेटे, वरना गब्बर आ जाएगा!

मशहूर शायर और स्क्रिप्ट राईटर निदा फाज़ली अपनी किताब चेहरे में लिखते हैं कि अमज़द खान का खुदा पर अक़ीदा इतना मजबूत था कि वो जुमे को रोज़ कोई काम भी नहीं किया करते थे, और इबादत में लगे रहते थे। अमजद खान को भारीय सिनेमा हमेशा गब्बर के रूप में याद रखेगा, लेकिन निजी जिंदगी में यह अमजद खान की एक सहनशील, संवेदनशील और दयालू इंसान थे।

(लेखक पूर्व आपीएस हैं)

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