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ईस्ट इंडिया कम्पनी की पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना पर विजय का जश्न क्यों मनाते हैं महार ?

देव प्रकाश बमनावत

आठ सौ महारों ने चितपावन ब्राह्मण पेशवा बाजीराव द्वितीय के अट्ठाईस हज़ार सैनिकों को घुटने टिका दिए थे. फिर योग्यता किसमें हुई ? कल इसी जगह प्रदर्शन में एक व्यक्ति की मौत हुई है. इस कहानी में आपको भारत के गुलाम बनने के कारण जानने को मिलेंगे, कैसे वर्णव्यवस्था के कारण देश का एक बड़ा तबका सामाजिक अयोग्यता के नाम पर मुख्य धारा से बाहर कर दिया गया था, आज भी उसके अवशेष देखे जा सकते हैं.

पुणे के पास कोरेगाँव भीमा गाँव में हर साल ये विजय उत्सव मनाने वाले लाखों दलितों को अब तक किसी ‘राष्ट्रवादी’ ने देशद्रोही का सर्टिफ़िकेट देने की हिम्मत नहीं की है. कोरेगाँव भीमा वो जगह है जहाँ ठीक दौ सौ साल पहले 1जनवरी 1818 को ‘अछूत’ कहलाए जाने वाले लगभग आठ सौ महारों ने चितपावन ब्राह्मण पेशवा बाजीराव द्वितीय के अट्ठाईस हज़ार सैनिकों को घुटने टिका दिए थे. ये महार सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़े थे और इसी युद्ध के बाद पेशवाओं के राज का अंत हुआ था.

इसे समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि पेशवा शासक अंत्यज (यानी वर्ण व्यवस्था से बाहर की जातियाँ) महारों के बारे में क्या सोचते थे और कैसे उन्होंने महारों की सामाजिक और आर्थिक दुर्गति के लिए ज़िम्मेदार सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जातीय भेदभाव के नियमों को कितनी कड़ाई से लागू किया.

एक जनवरी 2018 को देश के कई हिस्सों से हज़ारों हज़ार दलित कोरेगाँव भीम गाँव में इकट्ठा होकर अपनी विजय की दो सौवीं जयंती मनाने के लिए एकत्र हुए. महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी. ये उनके लिए चितपावन ब्राह्मण व्यवस्था से प्रतिशोध लेने का एक मौक़ा था क्योकि दो सौ साल पहले पेशवा शासकों ने महारों को जानवरों से भी निचले दर्जे में रखा था.

अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए ‘अस्पृश्यों’ के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया. इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके ‘प्रदूषित और अपवित्र’ पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण ‘प्रदूषित और अपवित्र’ न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

ये प्राचीन भारत से चले आ रहे वो नियम थे जिनके ख़िलाफ़ बौद्ध, जैन, अजित केसकंबलिन या मक्खलिपुत्त_गोसाल जैसे संप्रदाय बार बार विद्रोह करते रहे, पर हर बार इन दलित विरोधी व्यवस्थाओं को फिर से स्थापित किया गया. ऐसी व्यवस्था में रहने वाले महार दलित ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज में शामिल होकर लड़े तो वो पेशवा के सैनिकों के साथ साथ चितपावन ब्राह्मण शासकों की क्रूर व्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रतिशोध भी ले रहे थे.

अब इस युद्ध के दो सौ साल मनाने के लिए जब 2018 के पहले दिन सैकड़ों दलित संगठनों से जुड़े हज़ारों हज़ार लोग कोरेगाँव-भीम में इकट्ठा हुए तो वो ईस्ट इंडिया कंपनी की नहीं बल्कि भेदभाव पर आधारित ब्राह्मणवादी पेशवा व्यवस्था के ख़िलाफ़ दलितों की विजय का जश्न मना रहे थे.

कोरेगाँव भीमा में महार सैनिकों की विजय के दो सौ साल पूरे होने के जश्न में शामिल होकर दलित दरअसल आज की राजनीति में अपनी जगह ढूँढने की कोशिश के साथ साथ ब्राह्मणवादी पेशवा व्यवस्था को आदर्श मानने वाले हिंदुत्ववादी विमर्श का प्रतिकार भी कर रहे थे.

(लेखक आईआरएस हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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