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जन्म दिन विशेषः दिलीप कुमार उर्फ यूसूफ खान ‘आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे!’

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ध्रुव गुप्त

पिछली सदी के चौथे दशक में दिलीप कुमार उर्फ़ युसूफ खान का उदय भारतीय सिनेमा की शायद सबसे बड़ी घटना थी। एक ऐसी घटना जिसने हिंदी सिनेमा की दशा और दिशा ही बदल दी। दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा के पहले महानायक हैं। वे पहले अभिनेता हैं जिन्होंने यह साबित किया कि बगैर शारीरिक हावभाव और बड़े-बड़े संवादों के चेहरे की भंगिमाओं, आंखों और ख़ामोशी से भी अभिनय किया जा सकता है।

अपनी छह दशक लम्बी अभिनय-यात्रा में उन्होंने अभिनय की जिन ऊंचाईयों और गहराईयों को छुआ वह भारतीय ही नहीं, विश्व सिनेमा के लिए भी असाधारण बात थी। उन्होंने किसी स्कूल में अभिनय नहीं सीखा। प्रयोग और अनुभव से खुद को फिल्म दर फिल्म तराशने वाले दिलीप कुमार को सत्यजीत राय ने ‘द अल्टीमेट मेथड एक्टर’ की संज्ञा दी थी।

हिंदी सिनेमा के तीन शुरूआती महानायकों में जहां राज कपूर को प्रेम के भोलेपन और देव आनंद को प्रेम की शरारतों के लिए जाना जाता है, दिलीप कुमार के हिस्से में प्रेम की व्यथा आई थी। प्रेम की व्यथा की उनकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि दर्शकों को उस व्यथा में भी ग्लैमर नज़र आने लगा था। इस अर्थ में दिलीप कुमार पहले अभिनेता थे जिन्होंने प्रेम की असफलता की पीड़ा को स्वीकार्यता दी। ‘देवदास’ प्रेम की उस पीड़ा का शिखर था। देवदास की भूमिका उनके पहले कुंदनलाल सहगल और उनके बाद शाहरूख खान ने भी निभाई, लेकिन दिलीप कुमार की वेदना और गहराई को कोई छू भी नहीं सका।

11 दिसम्बर,1922 को पाकिस्तान के पेशावर जन्मे युसूफ खान के पिता विभाजन के दौरान अपनी पत्नी और बारह बच्चों के साथ मुंबई आकर बस गए थे। तंगहाली की अवस्था में युसूफ ने पुणे में एक छोटी-सी कैंटीन चलाई। यह कैंटीन भी बंद होने के बाद वे मुंबई लौट आए। पुणे की छोटी-सी कैंटीन से फिल्मों की बादशाहत तक का उनका सफ़र किसी परीकथा जैसा लगता है। संयोग से ही एक बार उस दौर की लोकप्रिय अभिनेत्री और फिल्मकार देविका रानी की नज़र उन पर पड़ गई। उन्होंने झटपट युसूफ खान को दिलीप कुमार का नाम देकर उन्हें अभिनेता बना दिया।

वर्ष 1941 में ‘ज्वारभाटा’ से अपनी फिल्मी पारी शुरू करने वाले दिलीप साहब को दर्शकों की स्वीकार्यता और बेहिसाब लोकप्रियता मिली फिल्म ‘जुगनू’ से। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है। अपने पांच दशक लंबे फिल्म कैरियर में दिलीप साहब ने साठ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय के नए-नए प्रतिमान गढ़े। वे पहले ऐसे अभिनेता थे जिनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर फिल्मों की कहानियां और पटकथाएं ही नहीं, गीत और संगीत भी रचे जाते थे।

फिल्मों में प्रेम की व्यथा की जीवंत अभिव्यक्ति के कारण उन्हें ‘ट्रैजेडी किंग’ ज़रूर कहा गया, लेकिन यह भी सच है कि अपने अभिनय की विविधता और रेंज से उन्होंने लोगों को बार-बार चकित किया है। वह ‘मेला,, ‘दीदार’, ‘उड़न खटोला’, ‘आदमी’, ‘दिल दिया दर्द लिया’ का असफल प्रेमी हो, ‘देवदास’ का आत्महंता हो, ‘शहीद’ का क्रांतिकारी हो, ‘मुगले आज़म’ का विद्रोही आशिक़ हो, ‘गंगा जमना’ का बागी डकैत हो, ‘कोहिनूर’, ‘आज़ाद’, ‘राम और श्याम’ का विदूषक हो, ‘शक्ति’ का सिद्धांतवादी पुलिस अफसर हो या ‘गोपी’ का मासूम ग्रामीण युवा – उनका हर किरदार उनके व्यक्तित्व पर फबता है।

उनकी कोई भी फिल्म देखकर यही महसूस होता है इस भूमिका को दिलीप कुमार से बेहतर कोई कर ही नहीं सकता था। अभिनय के अपने आखिरी दौर में भी उन्होंने ‘मशाल’,’कर्मा’,’विधाता’, ‘क्रान्ति’, ‘दुनिया’ और ‘सौदागर’ जैसी फिल्मों में बेहतरीन चरित्र भूमिकाएं निभाईं। 1998 में आखिरी बार उन्हें फिल्म ‘क़िला’ में देखा गया जिसके बाद उन्होंने फिल्मों को अलविदा कह दिया।

अभिनय के नए-नए आयाम गढ़ने वाले दिलीप साहब देश के पहले अभिनेता हैं जिनके नाम देश के सर्वाधिक पुरस्कार दर्ज़ हैं। उन्हें उनकी फिल्मों – दाग, आज़ाद, देवदास, नया दौर, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम तथा शक्ति के लिए आठ-आठ फिल्मफेयर पुरस्कार और कई दूसरी फिल्मों के लिए उन्नीस नामांकन मिले।

उनकी लिखित और बनाई फिल्म ‘गंगा जमुना’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बोस्टन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, कार्लोवी वेरी फिल्म फेस्टिवल और चेकोस्लोवाक अकादमी ऑफ आर्ट्स द्वारा भी उन्हें पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादासाहब फाल्के अवार्ड’ से ही नहीं नवाज़ा,1980 में उन्हें मुंबई का शेरिफ और 2000 में राज्यसभा का सांसद भी बनाया। उधर पाकिस्तान की सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ से नवाज़ा है। पाकिस्तान के पेशावर में उनके पैतृक घर को पाकिस्तान सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया हुआ है।

अपनी दो सह-अभिनेत्रियों – कामिनी कौशल और मधुबाला के साथ उनके असफल प्रेम उस दौर की चर्चित प्रेम कहानियों में ही नहीं शुमार किए जाते, सायरा बानो के साथ उनका लंबा साहचर्य फिल्मी दुनिया का सबसे सफल दांपत्य भी माना जाता है। इस सफल दांपत्य में एक छोटा-सा व्यतिक्रम तब आया था जब 1980 में उन्होंने आसमां नाम की एक औरत से दूसरी शादी कर ली थी।

शायद संतान पैदा करने में सायरा जी की शारीरिक असमर्थता की वज़ह से ही,लेकिन सायरा जी के विरोध के कारण जल्द ही यह अध्याय बंद भी हो गया। कुछ साल पहले दिलीप साहब की आत्मकथा ‘ द सब्सटांस एंड द शैडो’ प्रकाशित और चर्चित हुई थी जिसमें उन्होंने अपने जीवन के कई अनखुले पहलुओं पर रोशनी डाली है। अभिनय-सम्राट दिलीप कुमार पिछले कुछ सालों से लगातार अस्वस्थ चल रहे हैं। उनके 95 वें जन्मदिन (11 दिसंबर) पर उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की हार्दिक शुभकामनाएं !

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)