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बेग़म अख़्तरः गज़ल की वह आवाज़ जिसकी आवाज़ सुनने के लिये मक्का में लगी थी भीड़

नई दिल्ली – गजल की मलिका कही जाने वाली बेगम अख्तर अगर आज जिंदा होतीं तो वे पूरे 103 साल की हो गईं होतीं। मगर इस दुनिया में जो आया है उसे जाना तो है ही। शेक्सपीयर ने कहा था कि ये दुनिया एक स्टेज है जिस पर हर इंसान अपने करतब दिखाता है और चला जाता है। इसी ‘स्टेज’ पर बेगम अख्तर ने अपनी आवाज़ का एसा लोहा मनवाया था कि लोगों की जुबानों पर वे आज भी जिंदा हैं।

शराब और इस्लाम से बेगम अख्तर का रिश्ता

बेगम अख्तर के बारे में कहा जाता है कि वे कभी कभी शराब पी लेतीं थीं, लेकिन उन्होंने इस्लाम को अपनी जीवन शैली में हमेशा समाहित रखा। उनकी जिंदगी के बारे में कहा जाता है कि रमजान में इफ्तार का वक्त होने पर इफ्तार करने के फौरन बाद नमाज अदा करतीं और फिर तुंरत ही सिगरेट पीना शुरु कर देतीं थीं। जब वो दो सिगरेट पी लेतीं उसके बाद दोबारा आराम से बैठकर पूरी नमाज़ अदा करतीं थीं।

रमज़ानों को लेकर उनकी दिनचर्या पर रौशनी डालते हुए बेगम अख्तर की शिष्य हीरानंद बताती हैं कि बेग़म अख्तर रमजान में पूरे रोजे रखने की कोशिश करतीं थीं, लेकिन वे अपनी सिगरेट पीने की लत के सामने हार जातीं थीं, इस वजह से वे पूरे महीने में सिर्फ आठ या दस रोजे ही रख पातीं थीं।

हीरानंद बताती हैं कि वे हर रोज़ तिलावत ए कुरान करतीं थीं लेकिन कभी कभी हफ्तों तक कुरान शरीफ को ताक पर सजा कर रख देतीं थीं। बेग़म अख्तर कहा करतीं थीं कि उनका अल्लाह से निजी राब्ता है। कभी कभी वो रात दिन इबादत किया करतीं नमाज पढ़ करतीं और कभी कई दिनों तक भी नमाज अदा नहीं करतीं जब उनसे पूछा जाता कि नमाज नहीं पढ़ी ? तो वे सीध लहजे में कहतीं कि अल्लाह मियां से झगड़ा हो गया है।

अचानक हज पर चली गईं

आवाज़ की मलिका बेगम अख्तर एक बार मुंबई में गजल गायकी का प्रोग्राम कर रहीं थीं, वह सीज़न हज का सीज़न था उसी दौरान उनको अचानक हज को जाने का ख्याल आया, इस प्रोग्राम से मिली फीस को लेकर बजट की चिंता किये बगैर टिकिट लेकर हज पर चलीं गईं।

जब लग गई भीड़

बेग़म अख्तर हज पर तो चली गईं लेकिन मक्का के बाद जब वो मदीना गईं तो उनके पैसे खत्म हो चुके थे। फिर उन्होंने वहीं ज़मीन पर बैठकर नअत ए पाक पढ़ना शुरु कर दिया। बेग़म अख्तर की जादुई आवाज़ सुनकर उनके पास भीड़ जमा हो गई। उन्हें किसी ने पहचाना कि अरे ये तो बेगम अख्तर हैं, उसके बाद वहां के रेडियो स्टेशन ने बेग़म अख्तर को स्टूडियो बुलाया और उनकी आवाज़ में कई नअत रिकार्ड कीं।

गुजरात में ली थी आखिरी सांस

क्या संयोग है कि बेगम अख्तर का जन्म भी अक्टूबर में हुआ था और उन्होंने आखिरी सांस भी अक्टूबर में ही ली। आवाज की मलिका बेगम अख्तर 30 अक्तूबर 1974 को अहमदाबाद में मंच पर गजल पढ़ रही थीं, उकी तबीयत खराब थी, जिसकी वजह से अच्छा नहीं गाया जा रहा था.लेकिन ज्यादा बेहतर गजल गाने की चाह में उन्होंने खुद पर इतना जोर डाला कि उनकी तबियत और बिगड़ गयी उनका हार्ट अटैक से निधन हो गया.लखनऊ के बसंत बाग में उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया.

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