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बहादुर शाह ज़फ़र: वो बादशाह जिसने मौत के बाद भी लोगों के दिलों पर राज किया

राजीव शर्मा ‘कोलसिया’

बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में जब मैंने सबसे पहली बार पढ़ा तो उनकी तस्वीर देख मैंने अंदाजा लगाया कि वे कोई साधु या फकीर रहे होंगे, क्योंकि उनके चेहरे से किसी शासक का रौब नहीं बल्कि एक फकीर की विनम्रता ही झलकती है। मगर वे हिंदुस्तान के बादशाह थे। उनके प्रति मेरे दिल में इस बात को लेकर आदर है कि उन्हें अपनी अवाम से बहुत मुहब्बत थी। इस बात को लेकर दिलचस्पी है कि वे बहुत बड़े शायर थे, लेकिन इस बात को लेकर बहुत दुख भी है कि अंग्रेजों ने उन्हें बंधक बनाने के बाद रंगून (बर्मा) की जेल में डाला और उनके सामने उनके ही दो बेटों के कटे हुए सिर पेश किए।

1857 में जब हमारे देश में क्रांति हुई तो क्रांतिकारियों ने (जिनमें हर धर्म के लोग थे) बहादुर शाह ज़फ़र को अपना सर्वमान्य नेता और बादशा​ह स्वीकार किया था। दुर्भाग्य से उनका वह प्रयास उस समय सफल नहीं हुआ। जब ज़फ़र को कैद कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें बहुत अपमानित किया। इसके जरिए वे भारत के लोगों में खौफ पैदा करना चाहते थे कि देखो, हम तुम्हारे बादशाह का ये हाल कर सकते हैं तो तुम्हारी क्या बिसात है! ब्रिटिश हुकूमत को इस बात का डर था कि अगर ज़फ़र को भारत की किसी जेल में कैद किया गया तो लोग उनके नाम पर दोबारा एकजुट हो जाएंगे। इसलिए उन्हें रंगून भेज दिया।

चूंकि ज़फ़र शायर थे, इसलिए उन्हें कैद करने के बाद अंग्रेजों ने शायरी के जरिए ही उन्हें अपमानित करना चाहा। अंग्रेजों की ओर से कहा गया —

दमदमे में दम नहीं है

खैर मांगो जान की,

बस ज़फ़र बस चल चुकी

अब तेग हिंदुस्तान की।

ज़फ़र कहां सुनने वाले थे, उन्होंने फरमाया —

ग़ाज़ियों में बू रहेगी

जब तलक ईमान की,

तख़्त—ए लंदन तक चलेगी

तेग हिंदुस्तान की।

ज़फ़र बूढ़े हो चुके थे और अंग्रेजों के कैदी थे, लेकिन उनकी शायरी ने कभी गुलामी स्वीकार नहीं की। ज़फ़र ऐसे बादशाह थे जिन्हें अंग्रेज तो क्या मौत भी खामोश नहीं कर सकी। मरने के बाद उनकी बादशाहत लोगों के दिलों पर कायम रही। उनके शब्द आज भी कलकत्ते से कराची और लाहौर से लंदन तक गूंज रहे हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

 

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