Home पड़ताल सीरिया त्रासदीः कत्ल होती इंसानियत पर मानवधिकार के ठेकेदारों की मुजरिमाना खामोशी

सीरिया त्रासदीः कत्ल होती इंसानियत पर मानवधिकार के ठेकेदारों की मुजरिमाना खामोशी

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आसिफ राही

आज जो कुछ सीरिया मे हो रहा है उससे हम ही नही ब्लकि पूरी दुनिया वाकिफ है। हर इंसान मासूम बच्चो और बेकसूर लोगो का कत्ले-आम देखकर ना चाहते हुए भी खामोश है। बदकिस्मती ये है कि सीरिया मे रहने वालों और मासूमो के क़त्ल का जिममेदार और कोई नही ब्लकि सीरिया की ही हुकूमत यानि राष्ट्रपति बशर अल असद नाम का हुक्मरान है जिसने दमिश्क के करीब गूता शहर और उसके आस पास के इलाकों को बारूद की राख और मलबे मे बदल कर रख दिया है कल तक जहां रौनकें जलवा अफरोज़ थी आज वहां मौत का सन्नाटा छाया हुआ है जिधर नज़र जाये उधर सिर्फ खून से लथपथ लाशें और मासूम बच्चों की कब्र दिखाई देती है।

संघर्ष की शुरूआत

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ लगभग 7 साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक करीब चार लाख से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं जिनमे महिलाएं और बच्चो की संख्या अधिक है। इस गृहयुद्ध में पूरा देश तबाह हो गया है और दुनिया के ताक़तवर देश भी आपस में उलझ गए हैं। बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़़ अल असद की जगह ली थी. अरब के कई देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित सीरियाई नागरिकों के बीच बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव था जिस कारण मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था.

सीरिया की असद सरकार को यह असहमति रास नहीं आई और उसने आंदोलन को कुचलने के लिए पूरी क्रूरता दिखाई. जहां लोगों ने बशर अल-असद से इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया वही असद सरकार ने उनके दमन मे सख्ती दिखाई विरोधियों ने पहले अपनी रक्षा के लिये हथियार उठाये और बाद में अपने इलाक़ों से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालने के लिए इन हथियारों का इस्तेमाल किया.

असद ने इस विद्रोह को कुचलने और दूसरे देशों का समर्थन हासिल करने की नियत से इस विद्रोह को ‘विदेश समर्थित आतंकवाद’ करार दिया और इसे कुचलने और फिर से देश में अपना नियंत्रण कायम करने को पूरी ताकत झोंक दी दूसरी तरफ विद्रोही भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थे. इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई.

2012 आते आते सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध की चपेट मे जा चुका था. सीरिया पर अपना नियंत्रण कायम करने के लिये जो जंग शुरू हुई उसका नतीजा यह हुआ कि यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकलकर क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों के हाथों मे जा पहुंची. इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया जिनमे से कुछ ने असद तो कुछ ने विरोधियों को सैन्य, वित्तीय और राजनीतिक समर्थन देना शुरू कर दिया सीरिया में कई देशों की एंट्री से युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई

शिया बनाम सुन्नी

बाहरी देशों को सुन्नी बहुल देश सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने के लिए राष्ट्रपति बशर अल-असद का शिया समुदाय से होने का काफी फायदा मिला. इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हो गई। शिया-सुन्नी के विभाजन के कारण जिहादी ग्रुपों को भी यहां पसरने का मौक़ा मिला. हयात ताहिर-अल-शम ने अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-नुसरा फ्रंट से गंठबंधन किया. इसके बाद इसने सीरिया के उत्तरी-पश्चिमी राज्य इदलिब पर नियंत्रण कायम कर लिया दूसरी तरफ़ कथित इस्लामिक स्टेट का उत्तरी और पूर्वी सीरिया के व्यापक हिस्सों पर क़ब्ज़ा हो गया. यहां सरकारी बलों, विद्रोही गुटों, कुर्दिश चरमंथियों, रूसी हवाई हमलों के साथ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ.

ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके भी सीरियाई आर्मी की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंच गये। असद के लिए सीरिया में स्थिति मुश्किल होती जा रही थी. असद ने अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाकों में सितंबर 2015 में हवाई हमले शुरू कर दिये। लेकिन इस जंग में हमला एक साथ मिलकर नहीं बल्कि दो गुटों में बंटकर किया जा रहा है। एक तरफ है रूस जिसके साथ है सीरिया और इराक तो दूसरी तरफ है अमेरिका, जिसके साथ ब्रिटेन, तुर्की समेत बाकी पश्चिमी देश हैं। अगर सीधे और सपाट शब्दों में कहा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि एक बार फिर वैश्विक परिदृश्य में शीत युद्ध ने दस्तक दे दी है।

रूस ईरान जहां सीरिया समर्थक शिया और कुर्दिश लड़ाको का समर्थन कर रहे है और विद्रोहियों को विदेशी समर्थक आतंकवादी बताकर हवाई हमले कर रहे है। वही अमरीका का कहना है कि सीरिया को तबाह करने के लिए असद जिम्मेदार हैं इसी के साथ तुर्की और सऊदी अरब कुर्दिश लड़ाको को आतंकवादी मानते है और उनको अपना निशाना बना रहें है। संयुक्त राष्ट्र की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच सालों में कम से कम सीरिया में ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं.

हालांकि अगस्त 2015 के बाद से यूएन ने मरने वालों की संख्या को अपडेट करना बंद कर दिया है. कई संगठनों का कहना है कि तीन लाख 21 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं. एक थिंक टैंक ने चार लाख 70 हज़ार लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया है. फरवरी 2018 मे संघर्ष को रोकने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 30 दिन के संघर्षविराम पर सहमति बनी थी. सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों ने प्रभावित इलाके में सहायता पहुंचाने और मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराने के लिए वोट किया लेकिन इसके बावजूद रूस समर्थित शासन के सुरक्षा बलों द्वारा दमिश्क के बाहरी इलाके में 18 फरवरी के बाद से किए जा रहे हमले में कम से कम 177 बच्चों के साथ ही अब तक 800 नागरिकों की मौत हो चुकी है।

50 लाख से ज़्यादा लोग जिसमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं उन्हें सीरिया छोड़ना पडा जो अब तुर्की सहित दूसरे देशो मे शरण लिये हुए हैं। लेकिन सवाल ये पैदा होता है की सीरिया संकट की जितनी तस्वीरें और विडियो सीरिया से बाहर आई है उनमे हवाई हमलो के बाद ना कोई विद्रोही टैंकों पर मौजूद है और ना ही किसी के हाथ मे राकेट लांचर या बंदूक ही है अगर वहां कुछ दिखाई देता है तो मासूम बच्चो की लाशें और चीख पुकार करते उनके बेबस मां बाप।

तो फिर आतंकवादी है कहां ?

या फिर अंतराष्ट्रीय मीडिया से निकलकर आ रही खबरों के अनुसार इस आरोप के पीछे कुछ ताकतवर देशो के अपने हित छुपे है जो मासूम बच्चो औरतों और रिहाईशी इलाकों पर बम बरसाकर पूरे किये जा रहे है। हमारी मानना है कि सीरिया मे सयुंक्त राष्ट्र द्वारा लागू संघर्ष विराम को मानने के लिये हमारे देश को भी सीरिया पर कूटनीतिक दबाव बनाना चाहिये ताकि विश्व पटल पर मानवीय संवेदनाओं की रक्षा हो सके और निर्दोष मासूम लोगो की जानो को बचाया जा सके।

(लेखक पैग़ाम-ए-इंसानियत मुजफ्फरनगर के अध्यक्ष हैं)