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नज़रियाः RSS के लोग एससी. OBC को आरक्षण खत्म करने की बहस में उलझाकर उनके हिस्से की नौकरी हड़प रहे हैं।

अरविंद शेष

ओबीसी-एससी-एसटी ‘आरक्षण खत्म करो’ -यह राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब कोठारी बोलते हैं या भागवत बोलते हैं, हम तुरंत परेशान हो जाते हैं। उनकी वाजिब प्रतिक्रिया भी देते हैं, कहीं चुनाव हरा कर तो कहीं किसी रास्ते झुका कर, ठीक है। लेकिन जिस आरक्षण को खत्म करने के सवाल पर परेशान हो रहे हैं, वह लेंगे कहां…!

इतने सुनियोजित तरीके से साजिशन सरकारी नौकरियां तेजी से या तो खत्म की जा रही हैं या फिर वेकेंसी गायब, सालों से ठहरी हुई हैं! यानी जहां आरक्षण मिलना था, जहां जगह लेनी थी और उस जगह को विविधता से भरा हुआ बना सकते थे, वहां जगह ही चुपचाप खत्म किया जा रहा है। न नौकरियां होंगी, न आरक्षण होगा। फिर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य की सरकारी जिम्मेदारी का हक हासिल करने का सपना कहां होगा!

खुद मोदी सरकार के एक मंत्री संसद में कह चुके हैं कि केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में नवासी फीसद तक की कटौती कर दी गई है। यानी कि सौ में नवासी पद कटौती की मार मर रहे हैं और महज ग्यारह सीटों के लिए फिलहाल परीक्षा हॉल है। दूसरे क्षेत्रों में कितनी नौकरियां हैं और वे कैसे मिलती हैं और कितनों को मिल पाती हैं, यह हम सब अब जानते हैं।

लेकिन आरक्षण के लिए तूफान मचा देने वाले तमाम लोगों, नेताओं या राजनीतिक पार्टियों को कभी इस बात के लिए हंगामा मचाते देखा है आपने कि इतनी तादाद में नौकरियां कहां गायब हो रही हैं…? और जो बची हुई हैं, उनमें किस तरह के खेल चल रहे हैं ? सब कुछ चुपचाप चल रहा है।

इधर आपको आरक्षण की बहस में उलझाए रखना है और उधर चुपके-चुपके सारे मौके गायब कर देने हैं, प्राइवेट करके वहां आरक्षण बेमानी बना देना हैं। असल खेल यही है कि पिछले ढाई-तीन दशकों में आरक्षण के जरिए जो थोड़ा-बहुत डायवर्सिटी आ रही थी, उसे खत्म करना मकसद है। बिना रोजगार या सरकारी नौकरियों के सवाल पर जलजला लाए, तूफान मचाए अगर सिर्फ आरक्षण बचाने की दुहाई दी जाती है, तो वह बेमानी है, उसकी कोई अहमियत नहीं होगी।

(लेखक लंबे समय से पत्रकारित कर रहे हैं)

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