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पद्मावत के बहानेः भंसाली ने एक ऐसे अपराध को बढ़ावा दिया है जिसका खमियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ सकता है।

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अरविंद शेष

पद्मावत में जब से जौहर वाला दृश्य देखा है, दिमाग में कई हज़ार पत्थर रगड़ खा रहे हैं। सांय-सांय जोर की हवाएं दिमाग में फटाक फटाक घूम रही हैं। सही अल्फ़ाज़ नहीं निकल रहे खुद को व्यक्त करने के लिए। ऐसा लग रहा है कि हमारी तमाम ऊर्जा को सांप सूंघ गया हो।

हज़ारों औरतों के सामूहिक जौहर के दृश्य को जिस तरह से फिल्माया गया है, उसे देख कर मन गहरे क्षोभ और गुस्से से भर गया। दिमाग की नसें फटना चाह रही थीं। मन रुआंसा हो गया…! भंसाली अपनी काबिलियत पर भले ही रश्क कर रहे हों, लेकिन हमारी समझ में यह रचनात्मकता के विरुद्ध किया गया एक निहायत ही बेहूदा व्यवहार है।

आपने अपनी रचनात्मकता के लिए छूट ली, चलेगा! आपने तथ्यों से खिलवाड़ किया, यह भी चलेगा! लेकिन आप एक ऐसी प्रथा को ग्लोरीफाई कर हमारे दिमाग में पाजिटिवली चस्पां करने की आपराधिक कोशिश कर रहे हैं जो तब भी गलत थी और आज भी गलत है। यह कौन-सी विचारधारा हावी हो रही है बॉलीवुड पर… पहले ‘बेगम जान’ और अब ‘पद्मावत’!

आप जितने बड़े फिल्मकार या कलाकार का लेबल लिये फिरते हैं आपकी जिम्मेदारी भी उतनी बड़ी होती है। भंसाली सरीखे सभी कलाकार सुन लें- अगर आपमें इतनी तमीज़ नहीं है कि अपने इतिहास की बातों को आज के माहौल के हिसाब से जनता से कैसे कनेक्ट किया जाए तो आपकी रचनात्मकता दो कौड़ी की नहीं है।

हमने खुल कर हंसने के लिए, खुल कर रोने के लिए, खुल कर अपनी बात कहने तक के लिए हज़ारों साल संघर्ष किया है और आप ‘बिग कैनवास’ के चक्कर में हमारी उस आज़ादी की हत्या करने की कोशिश में हैं।

(लेखक युवा पत्रकार हैं)