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कोरेगांव हिंसाः पढ़े लिखे दलित युवाओं को चुन चुनकर गिरफ्तार कर रही है पुलिस

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अरविंद शेष

जब तक तंत्र ‘अपना’ नहीं है, क्रांतिकारी बन कर ‘जिंदा’ बचे नहीं रह सकते! खबर के मुताबिक भीमा-कोरेगांव में हमले के विरोध में सड़क पर उतरे बीस हजार लोगों को महाराष्ट्र में गिरफ्तार किया गया है! इंडियन एक्सप्रेस में यह भी खबर है कि MBA, IT, ENGINEERING के विद्यार्थियों को भी चुन चुन कर उठाया गया, उन पर गंभीर धाराओं में एफआईआर कर दिया गया! जबकि उनके घरवालों के मुताबिक वे घटना के वक्त अपने हॉस्टल या घर में पढ़ाई कर रहे थे!

इन सब गिरफ्तार लोगों का क्या हश्र किया जाएगा, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है! किसी खास पर कितना भी गंभीर मुकदमा लाद दिया जाए, उसे कोई फिक्र नहीं होती, क्योंकि उसका ‘अपना’ तंत्र कहीं भी किसी भी जाल से उसे निकाल लेता है! और किसी पर झूठा मुकदमा लाद कर उसे बर्बाद कर दिया जा सकता है, क्योंकि तंत्र उसके खिलाफ है! ‘राज’ या ‘सत्ता’ तब तक बेमानी है, जब तक तंत्र पर कब्जा नहीं है! और इस देश का तंत्र दलित-बहुजन जातियों और औरतों के खिलाफ है! पिछले ढाई दशकों से उसी तंत्र को बचाने और बनाए रखने की लड़ाई तंत्र के मालिक लड़ रहे हैं!

लेकिन ठहरिए!

अब दलित-बहुजनों के बीच यह राय ठोस हो गई है, और वे बोलने लगे हैं कि ‘जब दूसरे समुदाय विरोध जताते हैं तो उससे हुए नुकसान को लेकर सरकार आंखें मूंद लेती है। लेकिन हमारे मामले में प्रतिरोध को भी भयानक संकट के रूप में दिखाया जाता है! हम सिर्फ अपने बच्चों के लिए बराबरी का मौका चाहते हैं। हमारे बच्चे भी स्टूडेंट हैं, लेकिन मौके के अभाव में वे मेनस्ट्रीम में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं!’

यह राय अगर एक बड़े हिस्से के भीतर ठोस हो रही है तो कितने दिन तक और कब तक यह तंत्र इन्हें संभाल लेगा, या इनसे लड़ लेगा! याद रखिए, इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है! सपने भी अगर आप छीन रहे हैं, तो मर जाने ये क्या डर होगा..! लेकिन क्या अब ये पहले की तरह गुमनाम और चुपचाप ही मर जाने के लिए तैयार होंगे!

(लेखक लंबे समय से पत्रकारित से जुड़े हैं)