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शाबाश महाराष्ट्र के विजयी किसान सेनानियों, आखिर तुमने पूंजीपति प्रेमी सरकार को झुका ही दिया

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अरूण माहेश्वरी

ये तस्वीरें आज के ‘टेलिग्राफ’ के पहले पन्ने पर छपी है। इन लहू-लुहान बीवाइयों से भरे पैरों की छवियों ने देश भर के संवेदनशील नागरिकों को मथ दिया है। कहावत है – जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई । इन बीवाइयों में हमारे ग़रीब भारत की सारी पीड़ाओं को पढ़ा जा सकता है।

महाराष्ट्र के किसान मुंबई तक नारे लगाते लाँग मार्च कर रहे थे और मुंबई तक आते-आते उनके पैरों के फफोले पूरे देश को संदेश दे रहे थे – जागा है इंसान ज़माना बदल रहा। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने लड़ाई के मैदान में उतरे इन किसानों को बिल्कुल सही भारत के नये सैनिक कहा है। मुंबई के लोगों ने भी इन ज़ख़्मी पैरों पर मरहम लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत के कठोर परिश्रमी अन्नदाताओं का उन्होंने बाँहे खोल कर स्वागत किया। वाम-विरोधी पार्टियों के नेताओं तक ने इन बुज़ुर्गों और नौजवानों के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की।

मुंबई से हमारे किसान विजयी होकर लौटे हैं। पूरे देश के किसानों को इन्होंने बता दिया है कि जब तक स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू नहीं किया जाता है और किसानों को उनकी उपज पर लागत से डेढ़ गुना क़ीमत सुनिश्चित नहीं की जाती है, कोई भी किसी बैंक का कोई क़र्ज़ा नहीं चुकायेगा। और, फिर एक बार जाहिर हुआ कि जायज़ माँगों के लिये किया गया त्याग और बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता है।

सारी सरकारें सौ-दो सौ उद्योगपतियों को लाखों करोड़ का क़र्ज़ा अपनी ओर से ही माफ़ करती रही है। हमारे किसानों ने अपने इस हक़ को उनसे छीन कर हासिल किया है। जो यह समझते हैं, इससे आर्थिक स्थिति डगमगायेगी, वे अर्थनीति का कखग भी नहीं जानते। आम आदमी की आमदनी में वृद्धि का हर रूप अर्थ-व्यवस्था को बीमार नहीं, चंगा करता है। यह जरूर सच है कि देश के तमाम संसाधनों को पूँजीपतियों की सेवा में झोंक देने की सरकारी नीतियों पर दबाव पड़ेगा और वह समग्र दृष्टि से देश के लिये मंगलमय ही होगा।

महाराष्ट्र के किसानों को उनकी इस जीत के लिये हार्दिक बधाई। हम जानते हैं, सरकार के आश्वासनों पर वास्तविक अमल के लिये आगे उन्हें और लड़ना होगा। लेकिन यह भी जानते हैं कि भारत के किसानों में लड़ाई करने की ताकत की कोई कमी नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)