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नज़रियाः मोदी उस स्टेज पर नहीं पहुंचें हैं कि इजरायल के इशारे पर फिलिस्तीन से रिश्ता तोड़ सकें

अमरेश मिश्रा

इजरायल के प्रधानमंत्री बिनजामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आने वाले हैं। इजरायल के पीएम 15 जनवरी को भारत आ रहे हैं और 18 जनवरी तक भारत में रहेंगे। ऐसे में एक बार फिर यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच फंसा भारत का स्टेंड क्या रहना चाहिये। भारत ने बीते साल दिसंबर में अमेरिका के उस फैसले के खिलाफ वोट किया था जिसमें अमेरिका ने यरूशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता दी थी। यहां ये ध्यान देने योग्य है कि भारत ने यह वोट अमेरिका के खिलाफ तब किया जब अमेरिका धमकी दे चुका था कि उसके खिलाफ मतदान करने वाले देशों के साथ संबंध रखने पर पुनर्विचार किया जायेगा। बावजूद इसके भारत समेत 128 देशों ने अमेरिका के फैसले के खिलाफ वोट किया।

इजरायल और भारत

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से ही भारत ने इजरायल का पूरी तरह बायकाट किया हुआ था, लेकिन 1991 में भारत ने इजरायल को देश के रूप में मान्यता दी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंम्हा राव ने इजरायल से न सिर्फ संबंध स्थापित किये बल्कि कारोबार भी शुरू कर दिया। उसके बाद से केन्द्र में भाजपा और कांग्रेस बारी बारी से राज करती रहीं, लेकिन इजरायल के साथ भारत उसी पॉलिसी को अपनाये रहा जो पॉलिसी नरसिंम्हा राव ने बनाई थी। हालांकि बीच में यूपीए के दस साल के समय में भारत ने फिर उसी पॉलीसी को अपनाने की कोशिश की जो कांग्रेस की पुरानी पॉलीसी रही थी। लेकिन उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल से नजदीकियां बना लीं। वे इजरायल गये और अब इजरायल के पीएम भारत दौरे पर आ रहे हैं।

हिमाचल, गोवा, इजरायल

अक्सर यह सुनने में आता है कि हिमाचल प्रदेश और गोवा में इजरायल का दखल लगातार बढ़ रहा हैं। लेकिन यहां ध्यान देने योग्य है कि इन राज्यों में इजरायल का दखल आज से नहीं बल्कि लंबे समय से रहा है। कभी कभार इस तरह की खबरें भी आई हैं कि इन दोनों राज्यों के कुछ इलाकों में बोर्ड लगा दिया गया है कि ‘इंडियनस नॉट अलाउड’ लेकिन जब जब इसकी खोजबीन की गई है, जांच की गई है उसमें एसा कुछ नहीं पाया गया है। भारत और भारतीयों को नहीं भूलना चाहिये कि इजरायल से न तो भारत का और न भारत से इजरायल का रिश्ता भावनात्मक नही है बल्कि दुकानदार और ग्राहक का ही एक मात्र रिश्ता है। चूंकि इजरायल को अपने हथियार बेचने हैं, भारत हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है।

फिलिस्तनी और भारत

भारत के साथ फिलिस्तीन के बहुत अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन मौजूदा वक्त में भारत ने इजरायल के साथ भी अच्छे रिश्ते स्थापित करने की कोशिश की है। इसकी एक वजह यह भी है कि हाल ही में भारत ने फिलिस्तीन के समर्थन में वोट किया था जिससे देश के राईटविंग (हिन्दू कट्टरपंथी) को ग्रूप में यह संदेश गया कि भारत इस्लामिक देश के साथ है। चूंकि मोदी राईटविंग को नाराज करना नहीं चाहते इसलिये वे इजरायल के पीएम को भारत बुलाकर हिन्दुवादियों को भी खुश करने की कोशिश में हैं। अक्सर जब भी कश्मीर में अलगावादी ताकतें प्रदर्शन करती हैं तब देश का हिन्दुवादी तबका (आरएसएस) इस बात की वकालत करता नजर आता है कि कश्मीर में भारत को इजरायली पॉलीसी अपनानी चाहिये। यानी वह चाहता है कि जिस तरह इजरायल निहत्तथे फिलिस्तीनियों पर गोली और बम बरसाता है उसी तरह भारत भी वही व्यवाहर कश्मीरियों के साथ करे।

भारत ने कभी इजरायल को देश ही नहीं माना था, भारत की यह पॉलीसी नेहरू के समय में ही बनी थी जो लंबे समय तक कायम रही, हालांकि नरसिम्हा राव के समय में और मोदी काल में इस पॉलिसी में तब्दीलियां आई हैं। लेकिन अभी भी मोदी उस स्टेज पर नहीं पहुंचे हैं कि वे फिलिस्तीन के साथ रिश्ते खत्म करके इजरायल के साथ वही रिश्ता स्थापित कर लें जो फिलिस्तीन के साथ रहा था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मोदी नहीं चाहते कि दुनिया में यह मैसेज जाये कि वे मुस्लिम विरोधी हैं और दूसरी वजह है अरब देशों के साथ भारत के अच्छे संबंध।

इन्हीं सबंधों के कारण ही मोदी फिलिस्तीन से रिश्ते तर्क नहीं कर सकते। हां वह यह जरूर करेंगे कि खुद को न्यूट्रल दिखाने के लिये इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ ही रिश्ते रखेंगे, अंदरूनी तौर मोदी इजरायल के ज्यादा नजदीक हैं, वह इसलिये कि क्योंकि आरएसएस इजरायल को अपना आदर्श मानता है। भारत में होने वाले वे बम ब्लास्ट जिसमें आरएसएस के कार्यकर्ता गिरफ्तार किये गये और सजा पाये हैं उन आरोपियों ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि वे इजरायल से प्रेरित थे। यह बात भी कई बार सामने आई है कि इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद भारत में आरएसएस को आतंकवाद की तरफ धकेलना चाहती है।

किसके साथ रहे भारत ?

भारत को फिर से वही नीति अपनानी होगी जो अतीत में इस देश की नीति रही है, यानी पूरी तरह से इजरायल का बायकाट करना होगा,क्योंकि सभी को मालूम है कि इजरायल की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रतिष्ठा ही नही है और न ही कोई सम्मान है, लिहाजा भारता को ऐसे देश (जो कि देश है भी नही) से अपने संबंध पूरी तरह से समाप्त करने होंगे। हालांकि भाजपा सरकार के कार्यकाल में यह आसान नही है लेकिन दूसरी सरकार जरूर इस ओर ध्यान देंगी और पुराने रास्ते पर ही भारत को ले आयेंगी।

अमरेश मिश्रा

(अमरेश मिश्रा किसान क्रान्ति दल के अध्यक्ष हैं, यह लेख नेशनल स्पीक संवाददाता वसीम अकरम त्यागी से बातचीत पर आधारित)

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