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कोरेगांव हिंसाः मनुवादी ये जान ले कि रोहित वेमुला की कुर्बानी बेकार नही जाएगी।

अली जाकिर

एक ऐतिहासिक युद्ध जो लगभग 200 साल पहले हुआ, इसमें जीत अंग्रेजों की और अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रहे दलित समुदाय की हुई. 200 साल पूरे होने पर दलितों के शांति जुलूस में कथित ब्राह्मणवादी तत्वों का जो हमला हुआ वो भारतीय लोकतंत्र में एक कला धब्बा है. साल 1818 भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा की सेना को हराया था. इस बात की चिढ़ मराठी ब्राह्मणों को 200 साल बाद भी है. देश कहाँ से कहाँ पहुंच गया, इक्कीसवीं सदी आ गई लेकिन मनुवादी ताकतें आज भी दलितों को अपना गुलाम बना कर रखना चाहती है.

केंद्र और लगभग 80 प्रतिशत राज्यों में भगवा सरकार है आप कल्पना कर सकते है कि दलितों पर किस तरह के अत्याचार हो रहे होंगे ? कोरेगांव की घटना तो बस एक उदाहरण है. बाबा साहब के विचारों का फर्जी ढिंढोरा विदेशों में पीटने वाले देश के प्रधान सेवक को जवाब देना होगा. संकट की इस घड़ी में देश का मुसलमान दलितों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा है. AIMIM के औरंगाबाद से विधायक इम्तियाज जलील ने तत्काल एक प्रेस रिलीज निकाल कर प्रदेश और केंद्र की सरकार से जवाब मांगा और घायलों को देखने के लिए अस्पताल का दौरा किया. आर्थिक मदद की भी पेशकश पार्टी के द्वारा किया गया है.

आपको बता दें दलित नेता ब्रिटिश जीत का जश्न नहीं मनाते हैं. बल्कि उन सैनिकों की बहादुरी का जश्न मनाते हैं जो ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़े थे. ये सारे सैनिक महार रेजीमेंट के सैनिक थे जो दलित समुदाय के थे. इन्होंने संख्या में बहुत ज्यादा बड़ी पेशवा की सेना को हरा दिया था.  दलित समुदाय के लोग इस दिन को शौर्य दिवस के तौर पर मनाने के लिए युद्ध स्मारक की ओर बढ़ रहे थे. इसी दौरान उपद्रवियों ने शौर्य दिवस मनाने पहुंचे लोगों पर हमला कर दिया जिसमे एक शख्स की मौत हो गई और कई घायल हो गए.

गौर करने वाली बात है कि क्या आज अपने देश मे कमजोर वर्ग के लोग अपनी आवाज भी नही उठा सकते. अगर ऐसा है तो जरूर इसमे संघी सरकार का कोई गुप्त एजेंडा छिपा है. रोहित वेमूला को इसी संघी सोच ने मारा है. मनुवादी ये जान ले कि रोहित वेमुला की कुर्बानी बेकार नही जाएगी. जब-जब ऐसी घिनौनी हरकत होगी जिग्नेश मेवानी जैसे युवा आगे आएंगे और तुम्हारे मंसूबों को चकना-चूर करेंगे.

(लेखक इतिहास के जानकार हैं)

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