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विशेषः शिव सभी के हैं, अछूतों, दलितों, वंचितों के घरों में भी, खूंटा गाड़कर बैठ जाते हैं शिव

अभिषेक उपाध्याय

शिव। मुझे आज तक इनसे बड़ा क्रांतिकारी कोई नही लगा। कदम कदम पर। मान्यताओं। प्रतीकों। बिम्बों को तोड़ते शिव। शिवत्व के सांचे में समय को ढालते शिव। नित नए प्रतिमान गढ़ते शिव। शिव को आपने आभूषणों, अलंकारों से सुसज्जित कहीं नही देखा होगा। देवत्व की कुलीनता उन्हें छू भी नही सकी है। मेरी नज़र में शिव इस सृष्टि के पहले समाजवादी हैं। पहले और सच्चे समाजवादी। कालिदास की अमर कृति है, रघुवंशम।

राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक। रघुकुल वंश के बीस राजाओं का वर्णन है। इसमें रघु भी हुए। अज भी। दशरथ और राम भी। राम मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए। मगर वे क्रांतिकारी नही थे। वे समाजवादी भी नही थे। अपनी मर्यादा के चरमोत्कर्ष में भी वे एक राजा ही थे। एक यशस्वी राजा। उनकी मर्यादा की परिभाषा बहुत हद तक पारिवारिक और सामाजिक है। मर्यादा उनके लिए आचरण कम, तमगा अधिक है।

इसी तमगे को बचाए रखने की खातिर वे सीता को अग्नि की लपटों में उतरने को विवश कर देते हैं। इतिहास ने देवत्व को इतना लाचार कभी नही देखा। वो भी एक दुर्बल समाज की मान्यताओं के संरक्षक के तौर पर। राम पूरी उम्र परिवार और समाज की मर्यादा के मुताबिक चलते हैं। न कहीं विद्रोह करते हैं। न कोई सृजन करते हैं। वे कुछ नया नही गढ़ते। उनका रघुवंश एक रोज़ पतित और कलंकित होकर खत्म हो जाता है। इस वंश का अंतिम शासक अग्निवर्ण पतन और कलंक की भयानक सीमा को छूते हुए। ये साबित कर देता है कि समाज की सूखी टहनियों पर टिकी राम की मर्यादा टहनियों के जर्जर होते ही टुकड़े-टुकड़े हो बिखर जाती है।

वहीं शिव अपने हर पल में मौलिक हैं। नवीन हैं। प्रयोगशील हैं। उनका संसार। हम सबका संसार है। न अयोध्या। न लंका। न द्वारिका। न इंद्रप्रस्थ। कोई सांसारिक वैभव नही। कोई भौगोलिक सीमा नही। जटा। जूट। भस्म। वनस्पतियां। श्मशान की राख। सर्प। सब साधारण सा। आम सा। हमारे बीच सा। हम सा। इतना सहज कि घर से निकलो नही, कि शिव दिख जाएं। वे मिल जाएं।

ईश्वर क्या इतना सुलभ होता है! इतना आसान! ये तो पराकाष्ठा है। शायद यही कारण है कि मानव सभ्यता के प्रथम अवशेषों में शिव समाहित हैं। लगभग 5000 से 8000 साल के बीच की सिंधु घाटी सभ्यता के मोहन जोदड़ो नगर में शिव हैं। मोहन जोदड़ो। सिंधी भाषा में। मुर्दों का टीला। इसकी खुदाई में मिली पशुपति की मुहर शिव की मुहर है।

ये मानव की आरंभिक चेतना में शिव के होने का उदघोष है। मानवता की अनंत यात्रा में शिवत्व की अपराजेयता का पाथेय है। शिव को सृष्टि का संहारक माना गया है। मगर वे मेरी नज़र में सबसे बड़े सृजनकर्ता हैं। ये विनाश ही तो है जो सृजन का ‘स्पेस’ तैयार करता है। शिव ही इस सृजन के कारक हैं। शिव सृष्टि के आदिम प्रेमी हैं। कालिदास की कुमार संभव उमा के प्रति उनके प्रेम का चरमोत्कर्ष है। शिव सभी के हैं। अछूतों। दलितों। वंचितों के घरों में भी। खूंटा गाड़कर बैठ जाते हैं शिव।

संसार की सबसे बड़ी समाजवादी पूजा-पद्धति है, शिव की पूजा। बस एक पत्थर। एक लोटा जल। कहीं भी पूज लो शिव को। कहीं भी धूनी रमा लो। कहीं भी जी लो उन्हें। आज महाशिवरात्रि है। शिवोऽहम् में लीन हो जाने की रात्रि है। सूरज इस सृष्टि में अगर कहीं है तो इसी रात्रि में है। अंधेरे की गुफाओं में किसी ऐश्वर्य सा दमकता हुआ। शिव अर्धनारीश्वर हैं। नारी-पुरुष की समानता के सिद्धांत के आदि प्रणेता हैं। ये शिव और उमा के मिलन की रात्रि है। हमारे सौभाग्य की रात्रि है। जय शम्भो। हर हर महादेव।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं ये उनके निजी विचार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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