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जन्मदिन विशेषः अगर देश के लोगों ने मौलाना आज़ाद की बात सुनी होती तो बंगाल में 30 लाख लोग भूख से नही मरते।

अब्बास पठान

1940-45 तक मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे, ये वही दौर था जब देश मे मौजूद सांप्रदायिक कीड़े यहां की जड़ो में तेज़ाब डाल रहै थे, दूसरी तरफ “भारत छोड़ो आंदोलन” अपने शबाब पे था। उधर द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत की धरती पे पैदा हुए पराक्रमी सपूत अंग्रेज़ो के लिए लड़ रहे थे। उस दौरान बंगाल भी किसी से लड़ रहा था लेकिन उस लड़ाई का जिक्र कही किया नही जाता, उस लड़ाई में मरने वालों को शहीद का दर्जा नही दिया जाता। एक अनुमान के मुताबिक उस लड़ाई में 30 लाख लोग मर गये थे। ये लड़ाई भूख से थी.. उस समय बंगाल अकाल से जूझ रहा था, लोगो ने मुर्दा जानवरो का मांस खाकर खुद को जिंदा रखा था उस लड़ाई में..

कुल मिलाकर चार लड़ाईया थी जिसमे सबसे निम्नस्तर की लड़ाई हिन्दू मुस्लिम सिख दंगे रही है, अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़ाई में जिन लोगो ने भाग लिया उनकी आत्माए खुद पे फख्र कर सकती है लेकिन दंगो में मरने मारने के लिए घर से निकले लोगो की रूहों को खुद के वजूद पे शर्म आ रही होगी। वहीं द्वितीय विश्वयुद्ध में वीरता के झंडे गाड़ने वाले गुलाम मुल्क के निवासियो की आत्माए खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही होगी। भूख से मरने वाले लोग असली योद्धा थे, वे जीने के लिए लड़ रहे थे और लड़ते लड़ते मर गए, उनकी लड़ाई महान लड़ाई थी।

वे धर्म के लिए नही लड़े ना ही जमीन के टुकड़े के लिए उन लोगो ने क्रांति की, वे उस निवाले के लिए लड़े जिसके खातिर वे धरती पे आये थे.. ये वही निवाला था जिसकी ख्वाहिश ने आदम को जन्नत से रुखसत होने पे मजबूर कर दिया। एक मान्यता है की आदम धरती पे 300 वर्ष तक तन्हा भटकते रहे, रोते रहे । उस वक्त उनकी लड़ाई खुद से थी, खुद की ख्वाहिशो से लड़ रहे थे वे.. 300 वर्ष बाद उन्हें हव्वा मिली तब उनका सफर पूरा हुआ। आदमी जब कही तन्हा होता है, किसी ऐसे वीरान में फंसा होता है जहाँ उसके अलावा कोई नही, ऐसे हालात में उसे कोई इंसान नजर आ जाए तो गोया उसे फरिश्ता नजर आ गया हो यही कैफियत आदम की थी जब उन्हें हव्वा नजर आयी। दोनो ने एक दूसरे को देखा देख कर खूब रोये। आज जो लोग अपने इर्द गिर्द इंसानो को देखकर कुढ़ते है उन्हें उस समय इंसान की कद्र मालूम होगी जब वे कब्र में तन्हा होंगे, तब वे इंसान के कदमो की आहट के लिए तरसेंग।

आदम हव्वा की दास्तां से यहां ये साबित होता है कि जिंदा रहने के लिए केवल खान पान और शुद्ध वातावरण नाकाफी है, जब तक कोई मीत ना हो आपका, जबतक कोई शख्स ऐसा आपके जीवन मे न हो जिससे आप मुहब्बत करते हो तब तक जीवन कोई जीवन नही है। आदम के पास सारी धरती थी, ये पूरी जमीन और इसके तमाम संसाधनों पे आदम का ही एकाधिकार था किंतु फिर भी वे अधूरे थे, रोते रहे। बीवी हव्वा को देखा तो करार आया।

बहरहाल इन निवालों की लड़ाई, जमीनों की लड़ाई,वर्चस्व के लड़ाई और धर्म की लड़ाई को देख रहे मौलाना अबुल कलाम को एक और लड़ाई नजर आ रही थी,वो लड़ाई थी मुसलमानों में आपसी फिरकबाज़ी की लड़ाई.. मौलाना साहब ने लोगो को चेताया कि मत लड़ो, सब तुम्हारा ही है। हिन्दू मुस्लिम सिख और फिरको के कमांडरों से विनती करते रहे कि मत लड़ो मत लड़ो.. विभाजन मत होने दो,मत देश के टुकड़े करो, मत जाओ, मत मारो इस तरह से.. पढो, इल्म हासिल करो,आगे बढ़ो।

अपनी जिदंगी को आलम ए इंसानियत पे कुर्बान करो, धर्म और वर्चस्व की लड़ाई मत लड़ो। यदि मौलाना साहब की बात सुनी होती इस देश के लोगो ने तो बंगाल अकाल में 30 लाख लोग ना मरते.. ये रूह कम्पा देने वाला तथ्य है कि बंगाल जिस वक्त भूखमरी से तड़प तड़प कर मर रहा था उस समय वहाँ से अनाज निर्यात हो रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध और दंगो में मरने मारने वाले लोगो की रुंहै खुद के वजूद पे थूक रही होगी इस समय की हम धर्म और वर्चस्व की लड़ाई में मर गए और उधर लोग निवालों के अभाव में मर गए।

मौलाना आज़ाद के बाद कोई मौलाना आज़ाद पैदा नही हुआ। इस कौम ने अपने अपने फिरके के योद्धा बेशुमार पैदा किये, अब तक पैदा किये जा रहे है। अब शायद ही कोई मौलाना आज़ाद कभी पैदा होंगे जो हमे समझा सके कि “तुम्हारी बदहाली की वजह तुम खुद हो, कोई दूसरा नही, तुमने उस लड़ाई को चुना जिसने मुसलमानों की दो पीढ़ियों को अव्वल दर्जे का जाहिल बनाकर छोड़ दिया और अब तक भी तुम्हारी लड़ाई जारी है।

काश के तुम्हारी लड़ाई गरीबी अशिक्षा भखमरी बेरोजगारी से होती,काश तुम्हारी तकरीरों में, तुम्हारी जमातों में तुम्हारे शोले उगलते बयानों में शिक्षा की बात होती, मुंह फेरने के बजाय गले लगाने की बात होती..काश तुम एक मुहल्ले में 3 मस्जिदों के बजाय एक स्कूल बनाने की फिक्र में दर दर खैरात मांगते फिरते… काश ऐसा होता” लेकिन अब ऐसा शायद ही हो, क्योकि मौलाना आज़ाद हमारे बीच नही रहे।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं)

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